सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने लोकसभा में उठाया सवालः जब महंगाई और विकास कार्यों की लागत बढ़ी, तो सांसदों की एमपीलैड्स राशि क्यों नहीं?

वर्तमान महंगाई दर के हिसाब से एमपीलैड्स राशि की न्यायसंगत समीक्षा कर बढ़ाकर कम से कम दोगुना करने की मांग।

सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने लोकसभा में उठाया सवालः जब महंगाई और विकास कार्यों की लागत बढ़ी, तो सांसदों की एमपीलैड्स राशि क्यों नहीं?

नई दिल्ली, गिरीश सैनी। लोकसभा में रोहतक से सांसद दीपेन्द्र सिंह हुड्डा ने सवाल उठाया कि वर्ष 2011-12 के बाद से महंगाई और निर्माण कार्यों की लागत में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके बावजूद सरकार सांसदों के सालाना 5 करोड़ के स्थानीय विकास फंड में बढ़ोतरी क्यों नहीं कर रही है? कांग्रेस सरकार के दौरान एमपी लैड्स राशि बढ़ाई गई थी, लेकिन बीजेपी सरकार ने एक पैसा नहीं बढ़ाया। उन्होनें कहा कि वर्ष 2011-12 में जितने पैसों में तीन गलियां बन जाती थी, उतने पैसों में आज एक गली बन पाना भी मुश्किल है। एमपी लैड्स ग्रांट में निर्माण लागत को देखकर उसी अनुपात में बढ़ाया जाए। दीपेन्द्र हुड्डा ने सरकार से मांग की कि केंद्र सरकार तुरंत वर्तमान महंगाई दर के हिसाब से एमपीलैड्स राशि की न्यायसंगत समीक्षा करे और इसे बढ़ाकर कम से कम दोगुना करे, ताकि देश के हर संसदीय क्षेत्र की जनता को सही मायने में स्थानीय विकास का लाभ मिल सके।

दीपेंद्र हुड्डा ने सरकार से पूछा कि क्या जनता की बढ़ती जरूरतों को देखते हुए इस राशि की समीक्षा की गई है और क्या भविष्य में इसे बढ़ाने की कोई समयबद्ध कार्ययोजना है? जिसके जवाब में सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन राज्य मंत्री राव इंद्रजीत सिंह ने बताया कि वित्त वर्ष 2026-27 से 2030-31 तक सांसदों की वार्षिक निधि 5 करोड़ ही रहेगी। इतना ही नहीं, सरकार ने यह भी कहा कि इस आवंटन को बढ़ाने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है। सांसद दीपेन्द्र हुड्डा ने कहा कि 2011 से लेकर अब तक सीमेंट, सरिया, ईंट और मजदूरी कई गुना बढ़ चुके हैं। 2011 में 5 करोड़ रुपये में जितने स्कूल, अस्पताल, सड़कें या पेयजल परियोजनाएं बनती थीं, आज उसकी आधी भी नहीं बन पातीं। इसके बावजूद विकास निधि को 2030-31 तक के लिए फ्रीज करना जनता के साथ छलावा है।

रोहतक से सांसद दीपेन्द्र ने कहा कि सरकार बढ़ती महंगाई और जमीनी हकीकत से मुंह मोड़ रही है। सांसद निधि जनता से सीधे जुड़े मुद्दों - जैसे स्वच्छता, शिक्षा, स्वास्थ्य और पेयजल आदि कार्यों से जुड़ी होती है। 15 साल पुराने बजट को आज के महंगाई के दौर में जारी रखना आम लोगों के विकास अधिकारों पर अंकुश लगाने जैसा है।