आयुर्वेद के जनक और आरोग्य के देवता हैं भगवान धन्वंतरि: डा. जवाहर धीर

धनतेरस केवल धन की पूजा का पर्व नहीं है।

आयुर्वेद के जनक और आरोग्य के देवता हैं भगवान धन्वंतरि: डा. जवाहर धीर

फगवाड़ा, 5 नवंबर, 2026: पंजाब सरकार के सेवानिवृत्त जिला आयुर्वेद एवं यूनानी अधिकारी तथा चिकित्सकों की राष्ट्रीय संस्था नेशनल इंटेग्रेटेड मेडिकल एसोसिएशन (रजि.) नीमा की फगवाड़ा इकाई के पूर्व अध्यक्ष डॉ. जवाहर धीर ने कहा है कि कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी, जिसे हम धनतेरस के नाम से जानते हैं, केवल धन की पूजा का पर्व नहीं है। यह आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि के प्राकट्य का दिवस है। समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए मंथन किया, तब चौदह रत्नों के साथ हाथ में अमृत कलश लिए, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारी भगवान धन्वंतरि प्रकट हुए।

भगवान धन्वंतरि को भगवान विष्णु का ही अंशावतार माना जाता है। उनका अवतरण केवल अमृत प्रदान करने के लिए नहीं, बल्कि मानवता को रोगों से मुक्ति का ज्ञान देने के लिए हुआ। इसी कारण उन्हें आयुर्वेद के जनक कहा जाता है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद का अर्थ है — आयु का वेद, जीवन जीने का विज्ञान। भगवान धन्वंतरि ने अपने शिष्य सुश्रुत, जो विश्व के प्रथम सर्जन थे, आदि को इस ज्ञान का उपदेश दिया, जिससे शल्य चिकित्सा, जड़ी-बूटियों से उपचार, दिनचर्या, ऋतुचर्या और आहार-विहार की परंपरा विकसित हुई। आज भी आयुर्वेद के चिकित्सक किसी भी उपचार से पहले भगवान धन्वंतरि का स्मरण करते हैं।

धन्वंतरि जयंती पर हम सोना-चांदी खरीदते हैं, लेकिन सच्चा धन तो स्वास्थ्य ही है। शास्त्रों में कहा भी गया है — पहला सुख निरोगी काया है। धन नष्ट हो जाए तो दोबारा कमाया जा सकता है, पर स्वास्थ्य नष्ट हो जाए तो जीवन ही बोझ बन जाता है।

आज जब हम भागदौड़, तनाव, प्रदूषण और असंतुलित खान-पान के कारण अनेक रोगों से घिरे हैं, तब धन्वंतरि की शिक्षा और भी प्रासंगिक हो जाती है। वे हमें सिखाते हैं कि प्रकृति के साथ जीना, संयमित भोजन करना, समय पर सोना-जागना और मन को शांत रखना ही सबसे बड़ी चिकित्सा है।

डा. धीर ने कहा कि इस धनतेरस पर हमें केवल बर्तन और आभूषण ही नहीं, बल्कि अच्छे स्वास्थ्य का संकल्प भी लेना चाहिए। भगवान धन्वंतरि से प्रार्थना करनी चाहिए कि वे हमें, हमारे परिवार को और सम्पूर्ण समाज को निरोग, दीर्घायु और सुखी जीवन प्रदान करें।