मेरी नाराजगी और तुम

मेरी नाराजगी और तुम

तुम मनाते हो,
तभी तो ये नाराज़गी है…
वरना किससे 
शिकायत करें,
किससे अपने होने का 
हक मांगें।

जिस दिन तुम 
मनाने नहीं आए,
उस दिन 
सारी नाराज़गी 
खत्म हो जाएगी…
न कोई शिकवा रहेगा,
न कोई सवाल,
बस एक खामोशी 
होगी-
जो बहुत कुछ 
कहकर भी
कुछ नहीं कहेगी।

क्योंकि 
किसी और की बात हो,
तो मेरा एक ही 
जवाब होता है—
तुम सही, और मैं ग़लत…
और बस 
बात वहीं समाप्त । 

मगर- 
तुमसे बात हो,
तो दिल कहां मानता है,
कि कौन सही है, 
और कौन गलत…
दिल तो बस 
इतना चाहता है
कि तुम एक बार 
कह दो—
“चलो, छोड़ो…
मैं हूं ना।”

शायद 
मेरी नाराजगी भी
तुमसे ज्यादा देर 
तलक-- 
नाराज रहना 
नहीं चाहती,
वो तो बस तुम्हारे 
मनाने का 
इंतजार करती है।

जिस दिन तुमने 
मनाना छोड़ दिया,
समझ लेना…
मैं नाराज नहीं होउंगी,
बस तुमसे 
उम्मीद करना 
छोड़ दूंगी। 

क्योंकि नाराजगी 
वहीं होती है
जहां किसी के 
मनाने की 
उम्मीद बाकी हो…
जिस दिन उम्मीद 
मर जाती है,
उस दिन 
शिकायतें भी
चुपचाप मर जाती हैं।

टी शशिरंजन