कौए और बंदर
आज कल आफिस
आते जाते रोज ही
संसद मार्ग पर
बंदरों और कौओं के
झुंड को देखता हूं ।
दोनों ही झुंड आपस में
बात कर रहे होते हैं।
कौओं के मुख पर चिंता
तो बंदरों के मुख पर
संतोष दिखाई देता है।
ऐसे भी हाल के समय में
संसद मार्ग पर
बंदरों और कौओं की
संख्या कुछ अधिक
ही हो गयी है।
मानो वे पूरे कुनबे
के साथ चले आये हैं
और यहीं बस गये हैं ।
लेकिन ये संख्या-
संसद के आस पास ही है।
एक दिन मैने ऐसे ही
उनसे पूछ लिया
कहा मैं पत्रकार हूं
बताओ कैसे और क्यों
यहां आना हुआ ।
बंदरों ने संतोष जताया
मेरी ओर देखा और
घृणा भाव से दूसरी
तरफ चले गये ।
लेकिन कौए,
वे सब मेरे पास आये
कहने लगे, ऐसी खबर
है- अयोध्या में
भगवान राम के
मंदिर से वहां के
किसी संरक्षक ने
हमारे पुरखे,
काभुशुंडी जी की
चांदी की प्रतिमा
चंपत कर ली है ।
हम उसे वापस
मंदिर में
रखवाना चाहते हैं,
और अगर
कोई उसकी
रखवाली नहीं
कर सकता
तो मूर्ति
कौए समाज को
वापस लौटायी जाये
और इस
चौराहे का नाम
काकभुशुंडी चौक
किया जाए।
कौओं ने फिर कहा-
वानरों को संतोष है
उनके पुरखों की
मूर्ति अभी विद्यमान है।
लेकिन वे
खौफजदा हैं, और
उन्हें भी डर है कि कहीं
उनके पूर्वज की मूर्ति
कोई संरक्षक चुरा न ले ।
उन्होंने फिर कहा -
हमलोग इसलिये
यहां घूमते हैं कि
यहां संसद में
सबकी बात
उठायी जाती है और
उन्हें न्याय मिलता है ।
लेकिन अभी हम सबने
कल ही किसी को
यह कहते सुना है-
यहां मुद्दा उठाने वालों को
बोलने नहीं दिया जाता है,
उसकी आवाज भी
बंद कर दी जाती है और
फिर भी अगर बोलता है
और प्रश्न पूछता है तो उसे
जेल भेज दिया जाता है।
हम यह पता लगाने की
कोशिश कर रहे हैं कि
ऐसा हमारे देश में होता है
या पड़ोसी पाकिस्तान में
क्योंकि, बोलने वाला
देश का नाम नहीं ले रहा था।
लेकिन संसद मार्ग पर
ही टहल रहा था,
आपकी तरह शायद
किसी बड़े मीडिया
हाउस का निर्भीक
पत्रकार था ।
इसलिये हम यहां
यह पता लगाने आये हैं
और जब यह पता
चल जाये तो
हम उसके अनुसार
न्याय की मांग करें,
क्योंकि वानरों ने
आशंका जतायी है
जब पहरे पर बैठे
और अंदर बैठे
लोगों की
नहीं सुनी जाती है
तो हमारी कौन सुनेगा।
टी शशिरंजन

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