जब मैने तुम्हें देखा

जब मैने तुम्हें देखा

आज जब मैने 
तुम्हें देखा तो
याद आया अतीत,
मेरा बालकनी में 
खड़ा होकर तुम्हें 
एकटक निहारना।

पैदल चलते हुये
तुम्हारा अपने घर से
मेरे घर तक आना,
और फिर वहां से 
वापस हो जाना ।

मुझे याद आया
तुम्हारा साइकिल 
पर बैठ कर आना
और अचानक 
मेरे घर के सामने 
तुम्हारा ब्रेक लगाना।

तुम्हें देखना शायद 
आदत  बन गयी थी, 
समय के उस दौर में 
चाहती थी, तुम्हारे संग
साइकिल के पीछे 
दौड़ना और हंसना।

लेकिन- 
कुछ बंदिशें थीं 
और मैं ऐसा 
नहीं कर सकी।
लेकिन आज जब 
मैने तुम्हें देखा 
तो एक बार फिर से 
याद आया
तुम्हारा 
मोटरसाइकिल पर जाना। 

मैं देखती रहती थी 
तुम्हें उस पर जाते हुये 
और पीछे पलट कर 
तुम्हें मेरी ओर देख कर
मुस्कराते हुये । 

मुझे एक बार फिर 
स्मरण हो आया 
अतीत का 
वह क्षण जब 
तुम्हारे‘राजदूत’ 
की उड़ती धूल में 
नहा कर 
तुम्हें महसूस 
करने की इच्छा 

लेकन पाबंदियों ने 
पुन: मेरे पैर 
जकड़ लिये 
और मेरे हाथों ने
दिल पर हाथ रख
उन्हें जोर-जोर से
धड़कने से रोक दिया था।

लेकिन आज  
जब एक बार फिर 
तुम्हें देखा तो 
ऐसा लगा कि 
दौड़ कर पकड़ लूं 
मैं तेरा हाथ और 
चल दूं इस रस्ते पर  
जहां संग तुम रहो ।
लेकिन अबकी बार 
पारिवारिक मजबूरी 
ने रोक दिया ।
 
मैं चाहती हूं 
अपने शहर में 
तेरे साथ  
यूं हीं घूमना
तुम्हारे साथ 
चलते हुये 
बारिश में 
भींग जाना
ओर भींगते हुये
बरसात में 
चाय पीना ।
 
लेकिन काश 
आज मैं 
ऐसा कर पाती।
लेकिन- 
इस बार 
सामाजिक बंधनों
और- 
पारिवारिक बंदिशें । 
ऊफ्फ।

टी शशिरंजन