'आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर साहित्यिक संगोष्ठी का सफल आयोजन

अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पंजाब और हिंदी-विभाग, स्वामी स्वतंत्रानंद मेमोरियल महाविद्यालय, दीनानगर के संयुक्त तत्वावधान में “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर एक भव्य एवं प्रेरणादायक साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

'आत्मबोध से विश्वबोध’ विषय पर साहित्यिक संगोष्ठी का सफल आयोजन

दीनानगर, 28 अप्रैल 2026: अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पंजाब और हिंदी-विभाग, स्वामी स्वतंत्रानंद मेमोरियल महाविद्यालय, दीनानगर के संयुक्त तत्वावधान में “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर एक भव्य एवं प्रेरणादायक साहित्यिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य भारतीय चिंतन परंपरा के मूल में निहित आत्मबोध की अवधारणा को वैश्विक परिप्रेक्ष्य से जोड़ना था। कार्यक्रम की शुरुआत में अभासाप, नवांशहर की अध्यक्ष सुश्री लवली द्वारा परिषद-गीत का गायन किया गया। इसके बाद प्राचार्य डॉ. आर. के. तुली ने उपस्थित अतिथियों का स्वागत करते हुए अपने वक्तव्य में कहा कि आत्मबोध, विश्वबोध की पहली सीढ़ी है। जब तक हम स्वयं को नहीं समझते, तब तक संसार को समझना संभव नहीं। आत्मज्ञान से ही व्यापक दृष्टि का विकास होता है, जो अंततः मानवता को एक सूत्र में बांधने का कार्य करती है। उन्होंने महाविद्यालय की उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला।

इस अवसर पर अभासप की राष्ट्रीय संयुक्त महामंत्री प्रो. नीलम राठी विशेष रूप से उपस्थित रहीं और उन्होंने विषय की गहराई को रेखांकित करते हुए कहा कि आत्मबोध ही वह आधार है, जिससे व्यक्ति समाज और विश्व के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझता है। उन्होंने कहा कि आत्मबोध से विश्वबोध का अर्थ है—अपने भीतर की पहचान से पूरे विश्व की समझ तक पहुँचना। जब मनुष्य स्वयं को जान लेता है, अपनी शक्तियों, सीमाओं, मूल्यों और उद्देश्य को समझता है, तभी वह दूसरों और संसार को सही दृष्टि से देख पाता है। आत्मबोध व्यक्ति को अहंकार से दूर करके विनम्रता, संतुलन और विवेक की ओर ले जाता है।भारतीय संस्कृति में आत्मबोध से विश्वबोध की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान, योग और साधना के माध्यम से आत्मज्ञान प्राप्त किया और फिर अपने ज्ञान को विश्व के कल्याण के लिए समर्पित किया। उनके विचार आज भी हमें यह सिखाते हैं कि सच्चा विकास भीतर से प्रारंभ होकर बाहर तक फैलता है।

संगोष्ठी में विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति में आत्मज्ञान की महत्ता, उसके सामाजिक प्रभाव तथा वैश्विक शांति एवं सद्भाव में उसकी भूमिका पर अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के दौरान विभिन्न साहित्यिक प्रस्तुतियों ने वातावरण को ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायक बना दिया। प्रसिद्ध साहित्यकार श्री गोपाल कृष्ण शर्मा 'फिरोजपुरी' ने अपनी शायरी और ग़ज़लों से शमां बांध दिया। उन्होंने अपनी सद्य: प्रकाशित पुस्तकें भी अतिथियों को भेंट की।

अभासाप, पंजाब के प्रांतीय अध्यक्ष और गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभागाध्यक्ष तथा डीन, भाषा संकाय प्रो. सुनील ने अपने विशिष्ट वक्तव्य में कहा कि भारतीय साहित्य और संस्कृति सदैव आत्मबोध को सर्वोच्च स्थान देते रहे हैं, और यही विचार आज के समय में विश्व को दिशा प्रदान कर सकता है। आत्मबोध से व्यक्ति में सहानुभूति, करुणा और सहयोग की भावना विकसित होती है। वह केवल अपने हित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज और विश्व के कल्याण के लिए कार्य करता है। ऐसे व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में शांति, सद्भाव और एकता के दूत बनते हैं। इतिहास में अनेक महापुरुषों ने आत्मबोध के माध्यम से विश्वबोध की यात्रा की है। उन्होंने अपने आत्मज्ञान के बल पर समाज को नई दिशा दी और मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त किया। उनके जीवन से यह स्पष्ट होता है कि सच्चा परिवर्तन भीतर से ही प्रारंभ होता है।

अभासाप, पंजाब के उपाध्यक्ष और प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि विश्वबोध का अर्थ केवल ज्ञान का विस्तार नहीं, बल्कि करुणा, प्रेम और सह-अस्तित्व की भावना का विकास भी है। जब व्यक्ति यह समझता है कि सभी प्राणी एक ही परम सत्य के अंश हैं, तो वह भेदभाव, हिंसा और अन्याय से दूर रहता है। वह दूसरों के सुख-दुख को अपना मानता है और समाज के कल्याण के लिए कार्य करता है। इस प्रकार आत्मबोध से उत्पन्न विश्वबोध मानवता के लिए शांति और समरसता का मार्ग प्रशस्त करता है।

महाविद्यालय के हिंदी विभाग की अध्यक्ष प्रो. कंवलजीत कौर ने अपने संबोधन में कहा कि मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाओं की प्राप्ति नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के गूढ़ सत्य को जानना भी है। यही आत्मबोध है—स्वयं को समझना, अपने भीतर की चेतना, शक्ति और सत्य का अनुभव करना। जब व्यक्ति आत्मबोध की अवस्था को प्राप्त करता है, तब वह अपने सीमित स्वार्थों से ऊपर उठकर व्यापक दृष्टिकोण अपनाता है, और यही स्थिति विश्वबोध की ओर ले जाती है।

आभासाप, पंजाब की प्रांतीय महिला अध्यक्ष और कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. पूनम महाजन द्वारा मंच का सफल संचालन किया गया। उन्होंने गोष्ठी के विषय और उसकी महत्ता प्रतिपादित करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन परंपरा में आत्मबोध को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। उपनिषदों का “आत्मानं विद्धि” का संदेश इसी दिशा में प्रेरित करता है। जब व्यक्ति अपने भीतर के सत्य को पहचानता है, तो उसे यह अनुभव होता है कि समस्त सृष्टि एक ही चेतना से जुड़ी हुई है। यही अनुभव विश्वबोध का आधार बनता है। इस अवस्था में व्यक्ति जाति, धर्म, भाषा और सीमाओं से ऊपर उठकर समस्त मानवता को एक परिवार के रूप में देखने लगता है।

प्रो. सुबीर रगबोत्रा ने कहा कि जब व्यक्ति आत्मबोध के मार्ग पर आगे बढ़ता है, तो उसकी सोच संकीर्णता से मुक्त होकर व्यापक हो जाती है। वह केवल अपने परिवार, समाज या देश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सम्पूर्ण मानवता और सृष्टि के प्रति संवेदनशील हो जाता है। यही विस्तार विश्वबोध है—समस्त विश्व को अपने परिवार के रूप में देखना। इस अवस्था में व्यक्ति “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को आत्मसात कर लेता है।

अंत में अभासाप के प्रांत महामंत्री प्रो. विनोद कुमार ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों का आभार व्यक्त किया और इस प्रकार के कार्यक्रमों को निरंतर आयोजित करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि आत्मबोध और विश्वबोध एक-दूसरे के पूरक हैं। आत्मबोध के बिना विश्वबोध संभव नहीं, और विश्वबोध के बिना आत्मबोध अधूरा है। जब व्यक्ति अपने भीतर की ज्योति को पहचानता है, तभी वह सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करने की क्षमता प्राप्त करता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को आत्मबोध की दिशा में प्रयास करना चाहिए, ताकि वह स्वयं के साथ-साथ पूरे विश्व के कल्याण में योगदान दे सके। उन्होंने भरपूर आतिथ्य के लिए एस.एस.एम. महाविद्यालय की प्रबंधन समिति, प्राचार्य डॉ. आर. के. तुली और समस्त महाविद्यालय परिवार का आभार व्यक्त किया। 

यह आयोजन न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा, बल्कि समाज में सकारात्मक चिंतन और आत्ममंथन की भावना को भी प्रोत्साहित करने वाला सिद्ध हुआ। इस अवसर पर पठानकोट से कवयित्री श्रीमती कुसुम डोगरा, धारीवाल से डॉ. पवन कुमार, एस.एस.एम. महाविद्यालय, दीनानगर से प्रो. अमनजीत कौर, प्रो. नविता, प्रो. सुषमा, डॉ. राजन हांडा, डॉ. हरिंदर कौर, प्रो. रूबी, प्रो. वंदना, प्रो. शावनी ठाकुर और प्रो. मंजीत, विवेकानंद हाई स्कूल, दीनानगर से सुश्री दीक्षा, सर्वहितकारी विद्या मंदिर, तारागढ़ से सुश्री मीनाक्षी और सुश्री मीना, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर से डॉ. नेहा हंस, श्री योगेश कुमार, श्री अमरदीप सिंह, श्री गुरसेवक सिंह, श्री मो. बिलाल, श्री मुकेश कुमार, सुश्री पूजा देवी, सुश्री शशि कुमारी, श्री अभिजीत सिंह तोमर उपस्थित रहे। कार्यक्रम में उपस्थिति अतिथियों द्वारा डॉ. विनोद कुमार और डॉ. नीरज शर्मा द्वारा लिखी गयी महत्वपूर्ण पुस्तक 'भगवदगीता दर्शन' का विमोचन किया गया। सभी अतिथियों को परिषद और महाविद्यालय द्वारा अंगवस्त्र और स्मृति चिह्न देकर सम्मानित किया गया। अंत में राष्ट्रगान के साथ इस भव्य और दिव्य कार्यक्रम का समापन हुआ।