प्रेस की आज़ादी को निरंकुशता से बचाइए

वरिष्ठ पत्रकार व लेखक कमलेश भारतीय की कलम से

प्रेस की आज़ादी को निरंकुशता से बचाइए
कमलेश भारतीय।

मुम्बई के बांद्रा रेलवे स्टेशन पर जुटी भीड़ के दृश्य तो अभी आंखों में तैर रहे होंगे । लाॅकडाउन की परवाह न करते हुए प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में बांद्रा रेलवे स्टेशन पर जुटने लगे थे इस आस या अफवाह में कि रेल चलने ही वाली है और वे अपने गांव और घर पहुंच सकेंगे लेकिन रेल की जगह पुलिस बल पहुंचा और प्रवासी मजदूरों पर लाठीचार्ज कर सबकी रेल बना दी । यह क्यों हुआ ? एक पत्रकार की वजह से जिसने यह कहा कि प्रवासी लोगों के लिए रेल सेवा शुरू करने पर विचार किया जा रहा है और विचार होता कि उससे पहले ही बांद्रा रेलवे स्टेशन पर भीड़ जुटनी शुरू हो गयी । इसलिए राजीव कुलकर्णी नाम के इस पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया । अब जमानत देते हुए न्यायमूर्ति पीबी येलेंकर ने कहा है कि प्रेस की आजादी , प्रेस की निरंकुशता नहीं हो सकती । मीडिया का आम जनता पर बहुत प्रभाव होता है ।  इसलिए जरूरी है कि खबरें अधिक संवेदनशीलता के साथ तथा अधिक जिम्मेदाराना तरीके से बनाई जानी चाहिएं जिनमें खबर के उन परिणामों का पूर्वानुमान भी लगाया जाना चाहिए कि इसके प्रकाशन के बाद किस तरह के हालात हो सकते हैं ।
वैसे तो यह बहुत ही दुख की बात है कि पत्रकारों को न्यायाधीश सबक दे कि कैसे समाचार देने हैं और कैसे नहीं । लेकिन जिस हद तक मीडिया पहुंच गया है वहां न्यायमूर्ति भी सबक दें तो कोई बुरी बात नहीं । जीवन जिस समाचारपत्र में बिताया और जिन समाचार संपादक सत्यानंद बंसल शाकिर से पत्रकारिता के टिप्स ग्यारह वर्ष तक लिए , आज वे बहुत याद आ रहे हैं । उन्होंने बड़ा मंत्र दिया था कि पत्रकार समाज से कोई अलग प्राणी नहीं होता । जब भी कवरेज के लिए जाओ तो पहले एक आम आदमी की तरह ही व्यवहार करना । यदि सामने वाला अधिकारी या नेता ज्यादा ही पेलने या फैलने लगे तब अपना पत्रकार वाला रूप सामने लाना । हम पहले एक सामाजिक प्राणी हैं , बाद में पत्रकार । अगर कहूं कि मेरी दूसरी गुरु मेरी धर्मपत्नी नीलम है तो आप हंस सकते हैं । जब जब मेरी एक्सक्लयूसिव रिपोर्ट प्रकाशित होती तो मेरे से पहले वह पढ़ती और कभी कभी कहती कि यह खबर न भी करते तो क्या घट जाता आपका ? कई बार संपादक विजय सहगल का सुबह सुबह फोन आता तो मैं कहता कि आपने क्या कहना है मुझे , आपसे पहले तो घर में ही खिंचाई हो चुकी है इस खबर पर । मेरा कहने का मतलब यह कि एक आम गृहिणी भी जानती है कि इस प्रकाशित खबर का क्या असर समाज पर हो सकता है तो फिर हम सनसनी फैलाने की कोशिश करते समय सोचते क्यों नहीं ? कुछ चैनल्ज तो सनसनी कार्यक्रम ही परोसते हैं । आधी हकीकत होती है और आधा अफ़साना । बताइए ये किंवदंतियां समाज के किस काम कीं ? क्या वहां के निवासी नहीं जानते जो आप हजारों किलोमीटर दूर जाकर अफसाना बना रहे हो अंधविश्वास बढ़ाने के लिए ? आजकल एक नया कार्यक्रम भी लगभग सभी चैनलों में दिखाया जा रहा है कि वायरल खबर या सच की पड़ताल । अब जब सच है ही नहीं तो आप पड़ताल के नाम पर मज़े क्यों ले रहे हो और दर्शकों को मूर्ख बनाने की कोशिश क्यों कर रहे हो ? समाचारों को अब शो कहे जाने लगा है तो शो को लोकप्रिय बनाने के लिए जनता को भ्रमित करना जरूरी है क्या ? आप कहीं मत जाइएगा । हम ही आपको सच दिखा रहे हैं । ये दावे ऊपर से । आंकड़े दिए जाते हैं कि हम सबसे आगे और लोकप्रिय हैं । इस शो को ग्लैमरस बनाने के लिए महिला एंकर्स को ड्रेस कोड भी दिए जाने लगे हैं और हमें शक होने लगता है कि हम स्वदेशी चैनल देख रहे हैं या विदेशी ? समाचार वाचक या वाटिका तो गंभीर और गरिमापूर्ण ही अच्छे लगते हैं । यह फिल्मी मसाला इससे दूर ही रखिए तो बेहतर ।
 यह सत्य है कि आज लाॅकडाउन में भी मीडिया अपना धर्म निभा रहा है । कारगिल युद्ध हो या कोरोना युद्ध हर फ्रंटलाइन पर पत्रकार । फिर भी कुछ लोगों की गलत खबर से हम न्यायमूर्ति के टिप्स लेने के लिए शापित हैं । ज़रा सोचिए मित्रो, बहुत बार लिखा:
"आइना मुझसे मेरी पहली सी सूरत मांगे 
मेरे अपने मेरे होने की निशानी मांगें "