रिवीजन सर्जरी से घुटने के मरीजों को मिलेगी नई जिंदगीः डॉ. साइमन

टोटल नी रिप्लेसमेंट ऑर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र में सबसे सफल प्रक्रियाओं में से एक मानी जाती है।

रिवीजन सर्जरी से घुटने के मरीजों को मिलेगी नई जिंदगीः डॉ. साइमन

रोहतक, गिरीश सैनी। टोटल नी रिप्लेसमेंट ऑर्थोपेडिक सर्जरी के क्षेत्र में सबसे सफल प्रक्रियाओं में से एक मानी जाती है।

आमतौर पर एक आर्टिफिशियल जॉइंट लगभग 20 साल या उससे अधिक समय तक 90 प्रतिशत मरीजों में सही तरीके से काम करता है। लेकिन जैसे-जैसे इन सर्जरी की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे कम प्रतिशत में होने वाली जटिलताएं भी बढ़ जाती हैं, जिसके कारण कुछ मामलों में जॉइंट फेल हो जाते हैं और रिवीजन सर्जरी की जरूरत पड़ती है।

रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट्स एवं ऑर्थोपेडिक्स विशेषज्ञ डॉ. साइमन थॉमस ने बताया कि पहले माना जाता था कि एक बार जॉइंट फेल हो जाए तो उसका कोई समाधान नहीं होता, लेकिन अब आधुनिक तकनीक, बेहतर इम्प्लांट्स और विशेषज्ञ सर्जनों की मदद से फेल हुए जॉइंट को दोबारा ठीक किया जा सकता है, बशर्ते समय पर सही पहचान हो। उन्होंने बताया कि जॉइंट फेल होने के मुख्य कारणों में इन्फेक्शन, समय के साथ ढीलापन (एसेप्टिक लूज़निंग), अस्थिरता और चोट शामिल हैं। शुरुआती लक्षणों में चलना शुरू करते समय दर्द, लंगड़ाहट, अस्थिरता का एहसास, सहारे की जरूरत, असामान्य आवाजें और मूवमेंट में कमी शामिल हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

डॉ. साइमन ने बताया कि कुछ मामलों में दवाओं और अन्य कंजर्वेटिव उपायों से राहत मिल सकती है, लेकिन जरूरत हो तो रिवीजन सर्जरी में देरी नहीं करनी चाहिए। ये धारणा गलत है कि रिवीजन सर्जरी को जितना हो सके टालना चाहिए। ज्यादा देर तक ढीले जॉइंट पर चलने से हड्डी को नुकसान होता है, जिससे आगे की सर्जरी जटिल और महंगी हो सकती है। उन्होंने बताया नॉन-इन्फेक्टिव मामलों में एक ही स्टेज में विशेष इम्प्लांट्स की मदद से रिवीजन सर्जरी की जा सकती है। वहीं, इन्फेक्टेड मामलों में दो स्टेज में सर्जरी की जाती है, जिसमें पहले स्टेज में पुराने इम्प्लांट को हटाकर जॉइंट को पूरी तरह साफ किया जाता है और दूसरे स्टेज में नया इम्प्लांट लगाया जाता है।