शोध ही स्वास्थ्य विज्ञान की रीढ़, एआई बदलेगा इलाज के मायनेः कुलपति डॉ एच.के. अग्रवाल
यूएचएस में चौथा रिसर्च कॉन्क्लेव आयोजित।
रोहतक, गिरीश सैनी। पं. भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विवि में शुक्रवार को चौथा रिसर्च कॉन्क्लेव सुश्रुत ऑडिटोरियम (पीजीआईएमएस) में आयोजित किया गया। इस वर्ष कॉन्क्लेव की थीम ट्रांसफॉर्मिंग रिसर्च विद आर्टिफिशियल इंटेलिजेंसः इंपैक्ट ऑन हेल्थ है।
बतौर मुख्य अतिथि, कुलपति डॉ एच.के. अग्रवाल ने दीप प्रज्वलित कर कॉन्क्लेव का शुभारंभ किया। इस दौरान कुलसचिव डॉ रूप सिंह, निदेशक डॉ एस.के. सिंघल, डीन एकेडमिक अफेयर्स डॉ एम.जी. वशिष्ठ, डीन डॉ अशोक चौहान, चिकित्सा अधीक्षक डॉ कुंदन मित्तल, रजिस्ट्रार हरियाणा मेडिकल काउंसिल डॉ मंदीप सचदेवा तथा ऑर्गेनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ पुष्पा दहिया मौजूद रहे।
कुलपति डॉ एच.के. अग्रवाल ने सभी विशिष्ट वक्ताओं, शोधकर्ताओं और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि इस कॉन्क्लेव में लगभग 600 पंजीकरण हुए और 250 से अधिक एब्सट्रैक्ट प्राप्त हुए, जो विवि में शोध के प्रति बढ़ती जागरूकता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहां स्वास्थ्य चुनौतियां तेजी से जटिल होती जा रही हैं। उभरती संक्रामक बीमारियों से लेकर गैर-संचारी रोगों का बढ़ता बोझ, मानसिक स्वास्थ्य चिंताओं से लेकर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच तक, प्रत्येक मुद्दा न केवल क्लिनिकल विशेषज्ञता बल्कि मजबूत रिसर्च आधारित समाधान की मांग करता है। कुलपति ने जोर देकर कहा कि रिसर्च किसी भी शैक्षणिक संस्थान की रीढ़ है और स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
कुलपति डॉ. अग्रवाल ने सभी फैकल्टी सदस्यों से आग्रह किया कि वे युवा शोधकर्ताओं को समर्पण और धैर्य के साथ मार्गदर्शन दें। उन्होंने विवि की रिसर्च संचालित वातावरण को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा कि हम नवीन परियोजनाओं का समर्थन करना, साझेदारी मजबूत करना और ऐसे अवसर बनाना जारी रखेंगे जो हमारे शोधकर्ताओं को राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए सशक्त बनाएं।
कुलसचिव डॉ रूप सिंह ने कहा कि इस प्रकार के रिसर्च कॉन्क्लेव विवि में शोध संस्कृति को नई दिशा और ऊर्जा देते हैं। यहां प्रस्तुत होने वाले विचार और नवाचार सीधे मरीजों की देखभाल को बेहतर बनाने में सहायक होंगे। निदेशक पीजीआईएमएस डॉ एस.के. सिंघल ने कहा कि पीजीआईएमएस नवाचार और ट्रांसलेशनल रिसर्च के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि एआई, मशीन लर्निंग, बिग डेटा और प्रिसिजन मेडिसिन को अपनाकर हम रोगों की जल्द पहचान, सटीक इलाज और हेल्थकेयर की लागत कम करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि संस्थान में रिसर्च लैब, सिमुलेशन सेंटर और डेटा एनालिटिक्स सुविधाओं को लगातार अपग्रेड किया जा रहा है ताकि हमारे शोधकर्ता वैश्विक मानकों पर काम कर सकें।
चिकित्सा अधीक्षक डॉ. कुंदन मित्तल ने सभी विभागाध्यक्षों से आह्वान किया कि वे अपने विभाग में जर्नल क्लब, रिसर्च मीटिंग और इंट्रा-डिपार्टमेंटल प्रेजेंटेशन को नियमित करें ताकि छात्रों में शोध के प्रति रुचि बनी रहे। रिसर्च कॉन्क्लेव की इंचार्ज एवं ऑर्गेनाइजिंग चेयरपर्सन डॉ पुष्पा दहिया ने बताया कि इस वर्ष की थीम आज विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि आधुनिक स्वास्थ्य चुनौतियों को अलग-अलग हिस्सों में हल नहीं किया जा सकता। आज चिकित्सा तकनीक, डेटा साइंस, सामाजिक विज्ञान, पर्यावरण अध्ययन और यहां तक कि व्यवहार अर्थशास्त्र के साथ जुड़ती है। उन्होंने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस निदान में सहायता कर रहा है, जीनोमिक्स उपचार को व्यक्तिगत बना रहा है और डिजिटल हेल्थ प्लेटफॉर्म रोगी देखभाल वितरण को बदल रहे हैं।
जनसंपर्क विभाग के इंचार्ज डॉ. वरूण अरोड़ा ने बताया कि इस वर्ष कॉन्क्लेव में 600 प्रतिभागियों ने पंजीकरण कराया और कुल 290 शोध पत्र प्राप्त हुए, जिनमें से स्क्रीनिंग के बाद 251 का चयन किया गया। इनमें से 201 पोस्टर प्रकाशित किए गए और 50 शोधकर्ताओं ने ओरल प्रेजेंटेशन के माध्यम से अपनी रिसर्च प्रस्तुत की।
डॉ. सुंदर रमन स्वामीनाथन (प्रोफेसर एवं हेड, नेफ्रोलॉजी, टाटा-आईआईएससी मेडिकल स्कूल, बेंगलुरु) ने ट्रांसलेशन रिसर्च फॉर ट्रांसफॉर्मिंग मेडिसिन इन इंडिया विषय पर कीनोट एड्रेस दिया। उन्होंने किडनी रोगों में जीन थेरेपी और बायोमार्कर आधारित अर्ली डायग्नोसिस पर हो रहे कार्यों की जानकारी दी। डॉ. आशु ग्रोवर (साइंटिस्ट-जी, आईसीएमआर, नई दिल्ली) ने मेडिकल एथिक्स फोकसिंग पेशेंट वेलफेयर एंड राइट्स पर व्याख्यान दिया। डॉ. देवसेनाथिपति कंदासामी (प्रोफेसर, रेडियोलॉजी, एम्स, नई दिल्ली) ने ट्रांसफॉर्मिंग रिसर्च विद एआई इम्पैक्ट ऑन हेल्थ विषय पर कहा कि रेडियोलॉजी में एआई एल्गोरिदम अब चेस्ट एक्स-रे में टीबी, सीटी में स्ट्रोक और एमआरआई में ब्रेन ट्यूमर की पहचान मिनटों में कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि एआई डॉक्टर का विकल्प नहीं है, बल्कि रेडियोलॉजिस्ट की आंख और दिमाग को बढ़ाने वाला टूल है।
डॉ. गिरीश एन राव (प्रोफेसर ऑफ एपिडेमियोलॉजी, निमहंस, बेंगलुरु) ने डिकोडिंग हेल्थ, मेंटल हेल्थ एंड मेडिटेशन पर कीनोट लेक्चर देते हुए कहा कि मानसिक स्वास्थ्य को अब तक शारीरिक स्वास्थ्य से अलग करके देखा गया, लेकिन कोविड के बाद यह स्पष्ट हो गया कि दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
इस दौरान डीन छात्र कल्याण डॉ सविता सिंघल, डॉ. सुखबीर सिंह, डॉ. मंजू नाथ, डॉ. रमेश वर्मा, डॉ उमेश यादव, डॉ उर्मिल, डॉ मनीषा, डॉ प्रीति, डॉ. हरनीत, डॉ विवेक मलिक, प्राचार्य डॉ मनु राठी, प्रो सुनीता, डॉ सुमित सचदेवा, डॉ आर.के. शर्मा, डॉ बलजीत, डॉ आर.एस. चौहान, डॉ अपर्णा परमार, डॉ रमेश, डॉ अंतरिक्ष, डॉ सुधीर अत्री, सचिव संजीव कुमार, संपदा अधिकारी दुष्यंत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
कॉन्क्लेव में अच्छी रिसर्च के लिए डिपार्टमेंट ऑफ मेडिकल एजुकेशन की समस्त टीम को, डॉ. अनुपमा को प्रथम व डॉ. जितेंद्र वाधवानी को दूसरा अवार्ड मिला।
ओरल पेपर श्रेणी में पूर्वा सिंगला प्रथम, प्रियांशी बिष्ट दूसरे व अनीशा तीसरे स्थान पर रहे। इस रिसर्च कॉन्क्लेव में पहली बार यूजी छात्रों को भी नगद पुरस्कार दिया गया जिसमें तनुश्री ने प्रथम व सांभवी ने दूसरा पुरस्कार जीता। पैरामेडिकल श्रेणी में आरजू ने प्रथम व सिद्धांत ने दूसरा, पीजी पोस्ट डेंटल की श्रेणी में परिचय सिंघल ने प्रथम व अभिषेक ने दूसरा, एमबीबीएस श्रेणी में कृतिका ने प्रथम व भावना ने दूसरा स्थान प्राप्त किया।

Girish Saini 

