कविता/खामोशी/टी शशि रंजन

कविता/खामोशी/टी शशि रंजन

उस दौर की खामोशी में एक अजीब
सी गहराई थी…जैसे शब्दों की 
जरूरत ही न हो,और दिल 
अपनी ही भाषा में बात कर लेते हों।

न कोई वादे थे, न इजहार के लफ़्ज,
फिर भी हर एहसास मुकम्मल था
जैसे तुम्हें मेरे दिल का हर कोना मालूम हो,
और मुझे तुम्हारी हर खामोश धड़कन।

तुम्हारी एक नज़र ठहरती थी 
मुझ पर,और वक्त जैसे वहीं रुक जाता था…
मेरी एक हल्की-सी मुस्कान,और तुम्हारी 
दुनिया सिमटकर उसी एक पल में आ जाती थी।

हम बोलते नहीं थे,पर सब कुछ कह देते थे
शायद इसलिए उस दौर की खामोशी 
सबसे सच्ची, सबसे गहरी हुआ करती थी।

आज शोर बहुत है…
आवाजें भी हैं, लफ्ज भी हैं,
बहुत से सवाल भी हैं और जवाब भी
लेकिन दिल अजीब-सा खाली लगता है।

अब हम सब कुछ कह सकते हैं ,
हर बात लफ़्ज़ों में ढल सकती है…
पर ना जाने क्यों, बालपन का
वो सुकून कहीं रस्ते में खो गया है।

वो एहसास, जो कभी खामोशी में 
पलता था,
जो बिना कहे ही दिल तक उतर जाता था
आज वही बात, शब्दों के सागर में भी
अधूरी-सी रह जाती है।

तुम्हारे आज के अंदाज में 
आज भी, वही उस वक्त का अपनापन है,
वही हल्की सी मुस्कान, और मेरी चिंता 
जैसे हर बात के पीछे छुपी हो…जैसे,
तब, पढाई पर ध्यान दो और
अब, काम पर ध्यान दो ।

मगर उस अंदाज में आज वक्त की 
हल्की सी थकान भी झलकती है, 
जिसमें शामिल है, हम दोनों की आशंका
जैसे तुम्हारा डर, और मेरा भी।

लगता है,जैसे तुमने बहुत कुछ जिया है, 
तुमने  बहुत कुछ सहा है, मेरे बगैर।
तुम्हारी खामोशी यह कहती सी लगती है,   
तुम कह रही हो जैसे मुझे,
कि ‘अगर तुम मेरे साथ होते’ तो, 
तुम्हें शायद वह सब नहीं झेलना होता, 
वो सब नहीं सहना पड़ता
जो तुमने सहा है, या मेरा प्रेम
इन्हें और आसान बना देता।  

कभी हम खामोशी में करीब थे,
आज बातों में भी थोड़े दूर लगते हैं…
जिंदगी ने हमें अपने-अपने,  रास्तों पर 
इतना आगे धकेल दिया है
कि पीछे मुड़कर देखना भी 
एक अजीब सी कसक बन गयी है।

फिर भी…
कुछ एहसास ऐसे हैं 
जो ना तब बदले थे, 
और ना अब बदले हैं।

अब भी कोई फर्क नहीं है, 
तब भी हम खामोशी से 
एक दूसरे को जता कर 
और दुनिया से उन अहसासों
को छुपाकर, चुपचाप जीते थे,
जैसे हमारे बीच कुछ नहीं हो।

और आज भी हम दोनों उन्हें 
याद करके.....अहसास करके
और सबसे छिपा कर, एक दूसरे 
को जता कर, बता कर 
और अहसास करा कर जीते हैं।

अगर उस खामोशी में तुम 
एक बार हिम्मत कर लेती…
एक बार ‘राह-गुजर’ में
मिल लेती, तो शायद 
ये शोर आज इतना 
अजनबी नहीं लगता।
और,
तीन अशरे से 
तुम्हारी यादों में खोया,
तेरा बालसंगी, या तेरे 
उर में  बैठा तुम्हारा 
बालसखा इस 
‘प्रियसखी’ के लिये 
कविता नहीं करता।

टी शशि रंजन