टी शशिरंजन की कविता `हर धड़कन में बालसखा'
मैं चुप रहती थी, उस वक्त
मेरा दिल जोर से बोलता था,
यह मैं जानती थी, और तुम भी
कि मेरे हर धड़कन में नाम
बालसखा का ही धड़कता था।
नज़रों की उस खामोशी में,
लफ्जों से भी गहरी एक दास्तां थी,
हमदोनों की आंखों की दुनिया में,
हर एहसास की अपनी जुबां थी।
वहां शब्दों की जरूरत नही थी,
केवल एक नजर ही काफी थी,
उसी खामोश लम्हों में हमने,
हमारी मोहब्बत पूरी लिखी थी।
तुम्हें देखना मेरी इबादत थी,
बिना कहे ही तेरी हर बात
मेरी आदत थी, क्योंकि
आंखों से जुड़ा रिश्ता था, जिसमें
अल्फाजों से परे अपार गहराई थी…
इस जहां को मेरा ये सुकूं
कहां मंज़ूर था, हमारा यूं
खामोश मिलना जैसे कसूर था।
बिन आवाज धड़कती हमारी,
मोहब्बत से कायनात को ऐतराज था,
जो लफ्जों में नहीं, एहसासों में शामिल था।
चुपके-चुपके पलती रही जो
मासूम-प्रेम के दिल की दुनिया,
जमाने ने उसे बेदर्दी से तोड़ दिया,
हमने तो सिर्फ खामोशी से चाहा था
तुम्हें, और इस जहां ने मुझसे,
उसी खामोशी को ही छीन लिया।
तुम्हें मुझसे दूर कर दिया यूं,
जैसे कभी हम थे ही नहीं।
अब वही नजरें तन्हा हैं मेरी,
जिनमें बसते थे, केवंल तुम कभी।
अब भी जब आंखें बंद करती हूं,
तो वही लम्हे पास आ जाते हैं,
जहां सिर्फ तुम थे…और मैं थी,
हमारे बीच, हमारी नजरों से
नजदीकियां पलती थीं।
मगर अब तीस सावन बाद
बालसखा, जब तुम मिले,
तो ये दूरी ही सच्चाई है,
तेरी याद ही, बालसखी का अक्स है…
मैं आज भी तुम्हें वैसे ही देखती हूं,
बस फर्क इतना है—
बचपन में तुम मेरे सामने थे,
अब - कहीं और नहीं.....,
मेरे अंदर समाए हुए हो।
हां, मेरे अंदर समाये हुये हो।
समाप्त
टी शशिरंजन

City Air News 

