समय की धड़कनों को सुनता दिलीप कुमार पाण्डेय का काव्य संग्रह —“मैं समय हूँ”
हिन्दी साहित्य के पाठकों को समर्पित दिलीप कुमार पाण्डेय जी का काव्य संग्रह "मैं समय हूँ" कुछ महीने पहले मुझे प्राप्त हुआ था। इस पुस्तक को मुझे सप्रेम भेंट करते समय पाण्डेय जी ने इस पर 16 दिसंबर, 2025 की तारीख अपने हाथों से लिख रखी है। कई बार पुस्तक मेरे सामने आई कुछ हिस्से पढ़े भी। इस पुस्तक पर लिखने का विचार भी कई बार आया, मगर लिखने का समय ही ना मिल पाया। शायद इसीलिए क्योंकि समय कहता है - "मैं समय हूँ। तुम समय से पहले कोई कार्य कैसे कर सकते हो।" आज रात्रि के लगभग साढ़े ग्यारह बजे भी लिखने का कोई विचार नहीं था। मगर, एकाएक विचार आया कि अब उचित समय आ गया है। इस पुस्तक पर कुछ न कुछ अवश्य लिख दो।
यह आरम्भिक अनुभूति ही इस काव्य-संग्रह की मूल आत्मा को उद्घाटित करती है—समय का प्रतीकात्मक और वास्तविक दोनों रूपों में उपस्थित होना। समय केवल घड़ी की सुइयों में सीमित नहीं रहता, वह जीवन की स्मृतियों, अनुभवों, संबंधों और संघर्षों के बीच भी धड़कता है। यही धड़कन इस काव्य संग्रह की हर कविता में किसी न किसी रूप में सुनाई देती है।
पाण्डेय जी से शायद मेरी कभी मुलाकात नहीं हुई। हाँ, फ़ोन पर अवश्य दो-चार बार बात हुई है। बहुत मिठास भरी आवाज में बात करते हैं। उनकी जिक्र अक्सर प्रसिद्ध उपन्यासकार डॉ अजय शर्मा मेरे साथ फ़ोन पर करते रहते हैं। वैसे, पाण्डेय जी ने भी मेरी पुस्तक की समीक्षा की थी। समीक्षा भी पूरे दिल से की थी। अब आता हूँ काव्य संग्रह "मैं समय हूँ" पर।
बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक में कुल 68 काव्य रचनाएँ हैं। पुस्तक की भूमिका लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के प्रो (डॉ) विनोद कुमार ने लिखी है। इस काव्य संग्रह से पूर्व पाण्डेय जी के दो काव्य संग्रह आ चुके हैं। यह तथ्य इस बात का संकेत है कि कवि की लेखनी निरंतर साधना और अनुभवों से समृद्ध होती चली गई है। “मैं समय हूँ” उसी साधना का परिपक्व और गहन परिणाम प्रतीत होता है।
इस संग्रह की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसकी विषय-विविधता है। कविताओं के विभिन्न विषय लिए गए हैं। यह विषय समय चक्र के अनुसार चलते हैं क्योंकि इनमें अगर माँ का उल्लेख आता है तो संघर्ष और प्रेम बात भी होती है। रिश्तों, नैतिक, अनैतिक कार्यों और सामाजिक विसंगतियों की बात भी कवि के शब्दों में आती है। यहाँ समय एक सूत्रधार की तरह है, जो जीवन के हर प्रसंग को जोड़ता चलता है। कवि समय के माध्यम से जीवन की यात्रा को देखता है—जन्म से लेकर स्मृति तक, प्रेम से लेकर वियोग तक, आशा से लेकर निराशा तक।
छोटी और लंबी दोनों तरह की काव्य रचनाएँ इस पुस्तक का श्रृंगार बनी हैं। यह संतुलन पाठक को एकरसता से बचाता है। कहीं कवि कुछ पंक्तियों में गहरी बात कह देता है, तो कहीं विस्तृत कविता के माध्यम से विचारों का विस्तृत संसार रचता है। कवि बहुत सुन्दर ढंग से अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करता है। पाठक हर शब्द के साथ यात्रा करता हुआ प्रतीत होता है। यह यात्रा केवल कवि की नहीं, पाठक की अपनी भी हो जाती है।
इस संग्रह की कविताएँ संवेदनशील मन की अभिव्यक्ति हैं। इनमें जीवन की साधारण घटनाएँ भी असाधारण बनकर सामने आती हैं। कवि की दृष्टि समाज के हर कोने तक पहुँचती है। वह केवल भावुकता में नहीं बहता, बल्कि यथार्थ का सामना भी करता है। इसी कारण इस संग्रह में भाव और विचार का संतुलित समन्वय दिखाई देता है।
यह सत्य है कि किसी की अनुपस्थिति के कारण लोग किसी को भी कुछ ही दिन में भुला देते हैं। इसका दर्द भी कवि ने अपनी कविता दो शताब्दी' में इस तरह बयान किया है -मैं अचंभित हूँ /हैरान, थोड़ा परेशान/जब मैं शहर से /दो शताब्दी के बाद /लौटा हूँ गाँव /मुझे कुछ लोग /अनदेखा कर देते हैं'।
इन पंक्तियों में समय की निर्ममता और स्मृतियों की क्षणभंगुरता का मार्मिक चित्रण है। यह कविता केवल एक व्यक्ति की अनुभूति नहीं, बल्कि आधुनिक समाज की सामूहिक विडम्बना है। हम तेजी से बदलते समय में रिश्तों और स्मृतियों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। कवि इस पीड़ा को बहुत सहज शब्दों में व्यक्त करता है, जिससे पाठक सीधे जुड़ जाता है।
अपने शब्दों में उन्होंने खुद भी लिखा है कि -"समाज और परिवार के बीच पिस्ते /टूटते हुए रिश्तों , सामाजिक विसंगतियों को देखते/भोगते हुए मैंने काव्य-संग्रह में समय की उसप्थिति को अभिव्यक्त करने का प्रयास किया है"। यह कथन इस संग्रह की मूल संवेदना को स्पष्ट करता है। यहाँ कवि केवल दर्शक नहीं है, वह सहभागी है। उसने जो देखा और भोगा, वही उसकी कविता बन गया।
समकालीन समाज की जटिलताएँ इस संग्रह में स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। बदलती जीवनशैली, रिश्तों की दूरी, नैतिक मूल्यों का ह्रास और मनुष्य की बढ़ती अकेलापन—ये सभी विषय कवि की दृष्टि से बच नहीं पाए हैं। लेकिन इन सबके बीच आशा की किरण भी मौजूद है। कवि निराशा के अंधकार में भी उम्मीद का दीप जलाए रखता है।
प्रो (डॉ )विनोद कुमार ने भी कहा है कि यह संग्रह पाठक को केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि निश्चित ही, रूककर सोचने, स्वयं को देखने और अपने समय के प्रति उत्तरदायी होने के लिए प्रेरित करेगा। यह कथन बिल्कुल सटीक है। “मैं समय हूँ” केवल पढ़ने का अनुभव नहीं, बल्कि आत्ममंथन की प्रक्रिया है। यह संग्रह पाठक को अपने भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करता है।
इस काव्य संग्रह की भाषा सरल, सहज और भावपूर्ण है। कहीं भी अनावश्यक जटिलता नहीं है। यही कारण है कि यह संग्रह सामान्य पाठक से लेकर साहित्य प्रेमियों तक सभी को आकर्षित करता है। कवि ने शब्दों का चयन बहुत सावधानी से किया है, जिससे भावों की तीव्रता और प्रभाव दोनों बढ़ जाते हैं।
समग्र रूप से देखा जाए तो “मैं समय हूँ” जीवन की यात्रा का काव्यात्मक दस्तावेज है। यह संग्रह हमें समय के महत्व का बोध कराता है और यह भी याद दिलाता है कि समय के साथ चलते हुए भी हमें अपनी संवेदनाओं और रिश्तों को बचाए रखना चाहिए।
यह पुस्तक केवल कविताओं का संग्रह नहीं, बल्कि अनुभवों का दर्पण है। इसमें हर पाठक अपनी कहानी का कोई न कोई अंश अवश्य खोज लेगा। यही इस काव्य संग्रह की सबसे बड़ी सफलता है।
अंततः, यह कहना उचित होगा कि “मैं समय हूँ” हिन्दी काव्य जगत में एक महत्वपूर्ण योगदान है। यह संग्रह पाठकों को न केवल भावनात्मक रूप से समृद्ध करता है, बल्कि उन्हें अपने समय के प्रति जागरूक और उत्तरदायी बनने की प्रेरणा भी देता है। समय की धारा में बहते हुए भी यह पुस्तक हमें रुककर सोचने की कला सिखाती है—और यही इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।
-मनोज धीमान।

Manoj Dhiman 

