हास्य-व्यंग्य विसंगतियों के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम : प्रेम विज

हास्य-व्यंग्य विसंगतियों के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिरोध का सशक्त माध्यम : प्रेम विज

अमृतसर, 9 सितंबर 2026। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग द्वारा ‘हिंदी पखवाड़ा’ के अंतर्गत “पंजाब का हास्य-व्यंग्य साहित्य : विसंगतियों के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिरोध” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन स्वर्ण जयंती उद्यमिता और नवाचार केंद्र तथा राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान 2.0 के सहयोग से किया गया। कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार, चंडीगढ़ साहित्य अकादमी के पूर्व सचिव और संवाद साहित्य मंच के अध्यक्ष श्री प्रेम विज उपस्थित रहे। विश्वविद्यालय के सामाजिक विज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ. जी.एस. बाजवा ने विशेष अतिथि तथा लेखिका डॉ. सरला भारद्वाज ने प्रमुख उपस्थिति के रूप में कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाई।

कार्यक्रम के आरंभ में हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष एवं संगोष्ठी संयोजक प्रो. सुनील कुमार ने विषय की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हास्य और व्यंग्य केवल मनोरंजन के माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे समाज की विसंगतियों, विडंबनाओं, पाखंड और व्यवस्था की कमियों को पहचानने तथा उन पर सार्थक प्रश्न उठाने के प्रभावशाली साहित्यिक उपकरण हैं। हास्य व्यंग्य की परंपरा में दीपक जालंधरी, ईश्वर चंद्र नंदा, सदाराम चतरथ, सूबा सिंह, फकीरचंद शुक्ला, के.एल.गर्ग, जसपाल भट्टी , मेहर मित्तल, गुरप्रीत घुग्गी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। भांड और मरासी, टप्पे और बोलियों ने हास्य व्यंग्य की परंपरा को समृद्ध बनाया है। प्रो. सुनील कुमार ने विस्तारपूर्वक पंजाब की सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना में हास्य-व्यंग्य की परंपरा और समकालीन संदर्भों में इसकी उपयोगिता को रेखांकित किया। अपने स्वागत उद्बोधन में उन्होंने मुख्य वक्ता श्री प्रेम विज, विशेष अतिथि डॉ. जी.एस. बाजवा, डॉ. सरला भारद्वाज तथा अन्य अतिथियों का परिचय भी प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के यशस्वी उप-कुलपति प्रो. करमजीत सिंह के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से हिंदी विभाग द्वारा निरंतर साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कार्यक्रम के सफलतापूर्वक आयोजन में विशेष सहयोग के लिए डीन, अकादमिक मामले प्रो. हरविंदर सिंह सैनी और स्वर्ण जयंती उद्यमिता और नवाचार केंद्र की निदेशक प्रो. वसुधा संब्याल का भी आभार व्यक्त किया।

मुख्य वक्ता श्री प्रेम विज ने अपने व्याख्यान में पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य की परंपरा, उसकी विशिष्ट संवेदना और सामाजिक सरोकारों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि हास्य के भीतर छिपा व्यंग्य समाज को आईना दिखाने का काम करता है। पंजाब की जीवन-शैली, लोकभाषा, लोक-संस्कृति और आम जन के अनुभवों से निकला हास्य-व्यंग्य अपनी सहजता के कारण पाठक और श्रोता से सीधा संवाद स्थापित करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्चा व्यंग्य किसी व्यक्ति विशेष पर कटाक्ष मात्र नहीं होता, बल्कि उसके पीछे सामाजिक चेतना और सुधार की भावना होती है। उनके अनुसार विसंगतियों को उजागर करते हुए साहित्य जब पाठक को सोचने के लिए विवश करता है, तभी उसका रचनात्मक प्रतिरोध सार्थक बनता है। उन्होंने युवा रचनाकारों से आग्रह किया कि वे अपने समय की सामाजिक और मानवीय समस्याओं को संवेदनशील दृष्टि से देखते हुए हास्य-व्यंग्य को जनचेतना के प्रभावी माध्यम के रूप में विकसित करें। 

विशेष अतिथि डॉ. जी.एस. बाजवा ने कहा कि हास्य-व्यंग्य को सामाजिक विज्ञान की दृष्टि से भी समझे जाने की आवश्यकता है, क्योंकि यह समाज की मानसिकता, व्यवहार और संस्थागत विसंगतियों को उजागर करता है। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज से अलग नहीं होता और व्यंग्यकार अपने समय की वास्तविकताओं को जिस पैनी दृष्टि से देखता है, वह सामाजिक विमर्श को नई दिशा दे सकती है। उन्होंने पंजाब की बहुलतावादी और जीवंत सांस्कृतिक परंपरा में हास्य की सकारात्मक भूमिका को भी रेखांकित किया।

डॉ. सरला भारद्वाज ने कहा कि हास्य मनुष्य को कठिन परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण प्रदान करता है, जबकि व्यंग्य उसे अपने आसपास की विसंगतियों के प्रति सजग बनाता है। उन्होंने कहा कि साहित्य में हास्य-व्यंग्य की सार्थकता तभी है, जब वह संवेदना, मानवीय मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी से जुड़ा हो। उन्होंने पंजाब की साहित्यिक परंपरा में स्त्री दृष्टि, लोकजीवन और समकालीन सामाजिक सरोकारों को भी महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने अपनी कई पुस्तकें भी विभाग और विश्वविद्यालय को भेंट की।

कार्यक्रम में विभाग के शोधार्थियों और विद्यार्थियों ने विषय से जुड़े विभिन्न पक्षों पर गंभीरता से विचार-विमर्श किया। वक्ताओं ने इस बात पर विशेष बल दिया कि वर्तमान समय में बदलते सामाजिक मूल्यों, उपभोक्तावाद, राजनीतिक-सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संबंधों में आते बदलावों को अभिव्यक्त करने में हास्य-व्यंग्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो गई है। कार्यक्रम के दौरान हिंदी विभाग के शोधार्थी श्री अभिजीत सिंह तोमर के काव्य-संग्रह 'एकांत में बगावत' का विमोचन भी किया गया।

कार्यक्रम का मंच संचालन हिंदी विभाग के शोधार्थी श्री मुकेश कुमार ने प्रभावी ढंग से किया। 

इस अवसर पर हिंदी और संस्कृत विभाग के सभी अध्यापकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा बड़ी संख्या में साहित्य-प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम ने पंजाब के हास्य-व्यंग्य साहित्य की परंपरा, उसकी सामाजिक भूमिका तथा समकालीन प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद का अवसर प्रदान किया।