जीजेयू की डॉ. अनीता को वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट एवं बायो रिसोर्स प्रोजेक्ट के लिए मिला 32 लाख रुपये का शोध अनुदान

जीजेयू की डॉ. अनीता को वेस्ट वाटर ट्रीटमेंट एवं बायो रिसोर्स प्रोजेक्ट के लिए मिला 32 लाख रुपये का शोध अनुदान

हिसार, गिरीश सैनी। हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद (एचएसएचईसी) द्वारा गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विवि के सिविल एवं पर्यावरण अभियांत्रिकी विभाग की सहायक प्रोफेसर डॉ. अनीता सिंह किरडोलिया को हार्नेसिंग इंडीजीनस एल्गल स्ट्रेन्स फॉर वेस्ट वाटर रेमेडिएशन एंड क्लाइमेट-रेजिलिएंट बायो रिसोर्स डेवलपमेंट इन हरियाणा विषय पर शोध के लिए 32 लाख रुपये का अनुसंधान अनुदान स्वीकृत किया गया है। यह दो वर्षीय शोध परियोजना हरियाणा सरकार की महत्वाकांक्षी विकसित भारत अभियान पहल के अंतर्गत गठित हरियाणा राज्य अनुसंधान कोष (एचएसआरएफ) के तहत प्रदान की गई है।

कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई तथा कुलसचिव डॉ. विजय कुमार ने डॉ. अनीता सिंह को इस उपलब्धि पर बधाई दी।
कुलपति ने विश्वास व्यक्त किया कि यह अनुसंधान अनुदान वास्तविक दुनिया की गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों के लिए प्रभावशाली व स्थायी वैज्ञानिक समाधान खोजने की दिशा में संस्थान की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

डा. अनिता ने बताया कि वर्तमान समय में हरियाणा राज्य में तेजी से बढ़ते शहरीकरण, तीव्र औद्योगीकरण तथा गहन कृषि गतिविधियों के कारण अपशिष्ट जल (वेस्टवाटर) का सुरक्षित निस्तारण और शोधन एक विकराल पर्यावरणीय एवं जनस्वास्थ्य समस्या बनकर उभरा है। शहरों और उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट जल में अत्यधिक पोषक तत्व (जैसे नाइट्रोजन और फास्फोरस) के साथ-साथ कई विषैले रसायन व भारी धातुएं मौजूद रहती हैं, जो प्राकृतिक जल निकायों में मिलकर भूजल और नदियों को गंभीर रूप से प्रदूषित कर रही हैं। जल प्रदूषण की इस गंभीर समस्या का एक स्थायी, रसायन-मुक्त और प्रकृति-अनुकूल समाधान खोजने के उद्देश्य से इस शोध परियोजना के माध्यम से हरियाणा की स्थानीय/देशी शैवाल (काई) की प्राकृतिक प्रजातियों का पृथक्करण और संवर्धन करेंगी।

उन्होंने बताया कि इस शोध परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस हरित तकनीक को केवल प्रयोगशाला के शुरुआती परीक्षणों तक सीमित न रखकर इसे धरातल पर व्यावहारिक एवं पायलट-स्तरीय उपयोग के लिए परिपक्व बनाया जाएगा। जैविक विधि से शोधित जल का पुनरुपयोग कृषि, सिंचाई और औद्योगिक कार्यों में सुलभता से किया जा सकेगा, जिससे राज्य में भूजल के अति-दोहन पर रोक लगेगी और गहराते जल संकट को कम करने में मदद मिलेगी।