पुस्तक समीक्षा/`महामानव’ : तकनीक और मानवीय चेतना का अनूठा संगम

पुस्तक समीक्षा/`महामानव’ : तकनीक और मानवीय चेतना का अनूठा संगम

प्रेम विज, सचिव (पूर्व) चंडीगढ़ साहित्य अकादमी द्वारा। 

समकालीन हिंदी साहित्य में विज्ञान, तकनीक और मानवीय संवेदनाओं को एक साथ लेकर चलने वाली रचनाएँ अपेक्षाकृत कम दिखाई देती हैं। मनोज धीमान का उपन्यास ‘महामानव’ इसी दृष्टि से एक उल्लेखनीय कृति है। मनोज धीमान  का पत्रकारिता और साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।

 उपन्यास तकनीकी विकास, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, रोबोटिक्स और मानवीय चेतना जैसे आधुनिक विषयों के माध्यम से यह विचार सामने रखता है कि विज्ञान की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब उसके केंद्र में मानव और मानवता बनी रहे।

उपन्यास का केंद्रीय पात्र प्रशांत है, जिसकी वैज्ञानिक जिज्ञासा और कुछ नया करने की उत्कंठा उसके जीवन की दिशा निर्धारित करती है। बचपन से मशीनों और तकनीक के प्रति आकर्षण धीरे-धीरे उसे रोबोटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया तक ले जाता है। लेखक ने उसके जीवन-प्रसंगों के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास किया है कि जिज्ञासा, परिश्रम और निरंतर सीखने की प्रवृत्ति व्यक्ति को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा सकती है।

‘महामानव’ का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष औद्योगिक क्षेत्र में रोबोट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बढ़ते प्रभाव का चित्रण है। रोबोट उत्पादन क्षमता बढ़ाने, जोखिमपूर्ण और दोहराव वाले कार्यों को करने तथा कार्यों में सटीकता लाने में सहायक हो सकते हैं। लेखक ने चौथी औद्योगिक क्रांति और स्मार्ट फैक्टरी जैसे आधुनिक संदर्भों को भी कथा के साथ जोड़ा है। इस कारण उपन्यास केवल मनोरंजन तक सीमित न रहकर पाठक को बदलती तकनीकी दुनिया से परिचित भी कराता है।

उपन्यास का सबसे आकर्षक और विचारोत्तेजक पक्ष ‘शर्मिली’ नामक ह्यूमनॉइड का निर्माण है। वह मशीन होते हुए भी मानवीय व्यवहार, संवाद और भाव-भंगिमाओं की नकल करने में सक्षम दिखाई देती है। यहीं से उपन्यास विज्ञान की उपलब्धियों से आगे बढ़कर एक गंभीर दार्शनिक प्रश्न खड़ा करता है—क्या मशीन में चेतना विकसित की जा सकती है?

यह प्रश्न उपन्यास को विशेष गहराई प्रदान करता है। लेखक ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के साथ जुड़े नैतिक और सामाजिक प्रश्नों की ओर भी संकेत किया है। यदि मशीन मानव जैसी व्यवहार करने लगे तो उसके अधिकार क्या होंगे? मनुष्य और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संबंधों की सीमाएँ क्या होंगी? ऐसे प्रश्न भविष्य के समाज के लिए चुनौती बन सकते हैं। इस दृष्टि से ‘महामानव’ वर्तमान तकनीकी विकास और आने वाले समय के बीच एक विचारशील संवाद स्थापित करता है।

उपन्यास की भाषा अपेक्षाकृत सहज और प्रवाहपूर्ण है। तकनीकी विषयों को कथा के माध्यम से समझाने का प्रयास किया गया है, जिससे सामान्य पाठक भी विषय से जुड़ सकता है। विज्ञान और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन स्थापित करना इस कृति की प्रमुख विशेषता है।

‘महामानव’ का मूल संदेश तकनीकी श्रेष्ठता से कहीं आगे जाता है। मनुष्य की महानता केवल उसकी वैज्ञानिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी संवेदनशीलता, नैतिकता, सेवा, समर्पण और मानवता में निहित है। इसी अर्थ में उपन्यास का शीर्षक सार्थक हो उठता है।

मनोज धीमान का यह उपन्यास विज्ञान और साहित्य के बीच संवाद की संभावनाएँ खोलता है। ‘महामानव’ तकनीक के तेज़ी से बदलते युग में मनुष्य की पहचान, चेतना और मानवीय मूल्यों पर विचार करने के लिए पाठक को प्रेरित करता है। यही इस कृति की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, सी-515, बुद्ध नगर, इंद्रपुरी, नई दिल्ली-110012, पृष्ठ संख्या 144, मूल्य 299 रुपए।