हिंदी भाषा एवं संभावनाओं का नया आकाश

राजभाषा के रूप में स्वीकृति मिलने के बाद हिंदी ने साहित्य और पत्रकारिता से लेकर सिनेमा, जनसंचार, बाजार, इंटरनेट और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक एक लंबी और उल्लेखनीय यात्रा तय की है। उसका संसार निरंतर विस्तृत हुआ है। किंतु आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि करोड़ों लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली हिंदी क्या उसी अनुपात में ज्ञान-विज्ञान, उच्च शिक्षा, शोध और रोजगार की भाषा बन पाई है?

हिंदी भाषा एवं संभावनाओं का नया आकाश

प्रो. रश्मि बजाज (शिक्षाविद, साहित्यकार, विचारक) द्वारा।

मेरे विचार में हिंदी दिवस केवल मातृभाषा के उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन, उपलब्धियों के आकलन और भविष्य की दिशा तय करने का दिन भी है। राजभाषा के रूप में स्वीकृति मिलने के बाद हिंदी ने साहित्य और पत्रकारिता से लेकर सिनेमा, जनसंचार, बाजार, इंटरनेट और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक एक लंबी और उल्लेखनीय यात्रा तय की है। उसका संसार निरंतर विस्तृत हुआ है। किंतु आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि करोड़ों लोगों द्वारा बोली और समझी जाने वाली हिंदी क्या उसी अनुपात में ज्ञान-विज्ञान, उच्च शिक्षा, शोध और रोजगार की भाषा बन पाई है?

आधुनिक संदर्भ में भारतेंदु हरिश्चंद्र का कथन—“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल”—और भी व्यापक अर्थ ग्रहण करता है। अपनी भाषा की उन्नति केवल साहित्य-सृजन तक सीमित नहीं हो सकती। इसका अर्थ है कि विज्ञान, दर्शन, चिकित्सा, कानून, अर्थशास्त्र, तकनीक और आधुनिक ज्ञान की श्रेष्ठतम उपलब्धियां हिंदी में सुलभ हों। आज हिंदी को बचाने से अधिक आवश्यकता उसे समर्थ, सक्षम और आधुनिक बनाने की है।

किसी भी भाषा के विकास में साहित्य की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हिंदी की जीवंतता का सबसे बड़ा प्रमाण उसका समकालीन साहित्य है। स्त्री-विमर्श, दलित चेतना, आदिवासी अस्मिता, विस्थापन, प्रवासन, पर्यावरण संकट, सांप्रदायिकता, युद्ध, बाजारवाद, लैंगिक न्याय और हाशिये के समुदायों के अनुभवों ने हिंदी साहित्य के कथ्य और संवेदना का व्यापक विस्तार किया है। हिंदी आज सामाजिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का भी एक सशक्त माध्यम है।

वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता हिंदी के लिए चुनौती से अधिक अवसर प्रस्तुत कर रही है। हिंदी के श्रेष्ठ साहित्य, शब्दकोशों, विश्वकोशों, शोध और वैज्ञानिक सामग्री का गुणवत्तापूर्ण डिजिटलीकरण समय की महती आवश्यकता है। हिंदी को रोजगार और ज्ञान की भाषा के रूप में और अधिक सशक्त बनाना होगा। साथ ही, अनुवाद को एक राष्ट्रीय सांस्कृतिक परियोजना का स्वरूप देना होगा, ताकि हिंदी विश्व की भाषाओं के साथ बराबरी का संवाद करे—केवल ज्ञान ग्रहण करने वाली नहीं, बल्कि ज्ञान और विचार देने वाली भाषा के रूप में भी उभरे।

हिंदी का भविष्य अंग्रेजी अथवा अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं, बल्कि आदान-प्रदान और सहकार में है; केवल अतीत के गौरव गान में नहीं, बल्कि नए ज्ञान के निर्माण में है। उसकी वास्तविक शक्ति बोलने वालों की संख्या में नहीं, बल्कि उसमें रचे जाने वाले श्रेष्ठ साहित्य, दर्शन, विज्ञान, आलोचना और नए ज्ञान में निहित है।

मेरा विश्वास है कि भारत सरकार को हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषाओं में शामिल कराने के लिए एक सशक्त और व्यापक अभियान चलाना चाहिए। इससे हिंदी को वैश्विक मंच पर नई मान्यता, प्रतिष्ठा और संभावनाएं मिलेंगी। हिंदी का भविष्य केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि प्रयोगशालाओं, विश्वविद्यालयों, डिजिटल प्लेटफॉर्मों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नई दुनिया में भी निर्मित होगा।