मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में मनाया गया विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस
रोहतक, गिरीश सैनी। आत्महत्या जैसी गंभीर समस्या पर चुप्पी तोड़ने और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से पं. भगवत दयाल शर्मा स्वास्थ्य विज्ञान विवि के मानसिक स्वास्थ्य संस्थान में विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया गया। इस वर्ष के विषय- आत्महत्या पर विमर्श को बदलना और आह्वान - बातचीत शुरू करें की जानकारी भी दी गई।
कुलपति डॉ. एच.के. अग्रवाल ने अपने संदेश में कहा कि आत्महत्या को केवल व्यक्तिगत घटना मानकर नहीं चलना चाहिए। यह एक गंभीर जन-स्वास्थ्य चुनौती है। उन्होंने कहा कि हमें आत्महत्या को लेकर फैले भय, भ्रांतियों और सामाजिक कलंक को समाप्त करना होगा। समय पर मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस की निशानी है।
डीन डॉ अशोक चौहान ने बताया कि बड़े बदलाव की शुरुआत अक्सर एक छोटे, सकारात्मक और सार्थक कदम से ही होती है।
आईएमएच की निदेशक कम सीईओ डॉ सुजाता सेठी ने बताया कि डॉ. विद्यासागर ब्लॉक में मनोरोग विभाग की ओपीडी में हेल्प डेस्क सह जागरूकता गतिविधि के तहत ओपीडी में आए मरीजों और उनके परिजनों को आत्महत्या की रोकथाम, तनाव प्रबंधन और समय पर मनोचिकित्सक से संपर्क करने के महत्व के बारे में जानकारी दी गई।
शिक्षकों और विद्यार्थियों के लिए आयोजित संवेदनीकरण व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता मनोरोग सामाजिक कार्य विभाग के प्रोफेसर डॉ. भूपेंद्र सिंह ने अपने विचार रखते हुए कहा कि किसी भी विद्यार्थी का बदला हुआ व्यवहार एक सूचना है, कोई बीमारी का ठप्पा नहीं। यदि कोई विद्यार्थी अचानक पढ़ाई में पिछड़ने लगे, कक्षाओं से गैर-हाजिर रहने लगे, अपने साथियों से दूरी बना ले या क्लीनिकल चर्चा में भाग लेना बंद कर दे, तो यह समझना जरूरी है कि उसके भीतर कुछ ऐसा चल रहा है जो बाहर से दिखाई नहीं दे रहा।
उन्होंने कहा कि पढ़ाई में कमजोरी के पीछे भाषा की दिक्कत, अकेलापन, पैसों की तंगी, आत्मविश्वास में कमी, रिश्तों में तनाव, नींद पूरी न होना या किसी प्रकार का उत्पीड़न जैसे कई कारण हो सकते हैं। ऐसे में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि इस विद्यार्थी में क्या खराबी है, बल्कि यह होना चाहिए कि इसके सामान्य व्यवहार में क्या बदलाव आया है और इसके साथ क्या हो रहा है।उन्होंने रेड फ्लैग फ्रेमवर्क के बारे में भी बताया,
डॉ. सुजाता सेठी ने कहा कि निर्णय लेने या कोई कदम उठाने से पहले सामने वाले को ध्यान से देखना और समझना सबसे जरूरी है। एक निजी और सम्मानजनक बातचीत मदद का दरवाजा खोल सकती है।
इस दौरान आपातकालीन सहायता के लिए जरूरी हेल्पलाइन नंबर भी साझा किए गए।
डॉ सुजाता सेठी ने बताया कि एमडीयू के मनोविज्ञान विभाग के सहयोग से एक दिवसीय कार्यशाला भी आयोजित की गई, जिसका विषय - छोटा कदम, बड़ा बदलाव रहा। बतौर संसाधन व्यक्ति डॉ. सिद्धार्थ आर्या ने आत्महत्या से जुड़े कारणों, जोखिम कारकों, चेतावनी संकेतों और सबसे जरूरी - कैसे मदद पहुंचाई जाए, इस पर विस्तार से चर्चा की। कार्यशाला में करीब 150 विद्यार्थियों ने भाग लिया।

Girish Saini 

