व्य॔ग्य/क्यों नहीं आते लेखक अच्छे अच्छे...

व्य॔ग्य/क्यों नहीं आते लेखक अच्छे अच्छे...
कमलेश भारतीय।

-कमलेश भारतीय 
अपने देश के विश्वविद्यालयों में अभी तक सिर खफा रहे हैं शोधार्थी कि सूरदास वगैरह प्राचीन कवियों के जन्मस्थान कहां हैं ? बेचारे शोध छात्र क्या करें ? सूरदास और तुलसीदास के काव्य सौंदर्य का आनंद लेने की बजाय उनके जन्म मरण के रहस्य में फंसे हैं । 
दूसरी तरफ हालत संत कवियों की भी अच्छी नहीं । कोई उन्हें कहीं विराजमान करता है तो कोई दूसरा कहीं और शोभायमान कर देता है । बेचारे संत कवि । इतिहास में भी एक जगह टिक कर बैठ नहीं सकते । भक्ति में , काव्य में , लेखन में गले गले तक यानी आकंठ डूबे रहे और साहित्य रचते रहे । अपने शिष्यों को अपने बारे में कुछ भी नहीं बताया । बस , काव्य ग्रंथ हाज़िर कर दिये कि लो , इनमें हमें ढूंढो रे बंदे । उन संत कवियों की नज़र में जन्म स्थान, जन्म तिथि व दूसरी किस्म के निजी ब्यौरे गैर-जरूरी थे । उनकी नज़र में मंगल की भावना ही प्रमुख थी ।
जहां प्राचीन कवि अपने लेखन से आज तक जाने पहचाने जाते हैं , वहीं आज लेखक तो मौजूद है लेकिन उसका लेखन गायब है । आज लेखक की साक्षात मूर्ति के दर्शन तो हो सकते है पर उसके लेखकीय दर्शन व विचार क्या हैं , इसे शोध का विषय बनाना पड़ेगा । आज का लेखक आत्मकथा और गर्दिश के दिन जैसी आत्मरचनाएं पहले लिखता है और असली लेखन बाद में करता है । यह है मैनेजमेंट फंडा । शायद वह हिन्दुस्तानी फिल्मों की हीरोइन की तरह आंसू अधिक बहाता है और मतलब की बात कम ही करता है । 
आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह भारतेंदु माने जाते हैं । सब जानते हैं कि भारतेंदु इनका नाम नहीं बल्कि उपाधि है -प्यार से दी हुई उपाधि । इन्होंने सितारे हिंद बनने की बजाय भारतेंदु बनना पसंद किया । अंग्रेज सरकार की बजाय जनता से मिली उपाधि स्वीकार की । पुरस्कार की दौड़ में शामिल न होकर हिंदी सेवा की दौड़ में शामिल होना पसंद किया । एक पूरा युग भारतेंदु के नाम हो गया । आज लेखक पुरस्कारों के पीछे इतने दीवाने हो चुके हैं कि जैसे तैसे पुरस्कार पा लेना चाहते हैं और पुरस्कृत होने का गौरव पा लेना चाहते हैं । इसीलिए पुरस्कारों की  अहमियत गौण होती जा रही है और राशि महत्त्वपूर्ण होती जा रही है । ऐसा लगता है कि ये पुरस्कार लेखन पर न होकर किसी ताश या लाॅटरी के रूप में निकाले जाते हों । या किसी औघड़ बाबा के आशीर्वाद का फल । सही लेखक की पहचान लेखन से होती है न कि पुरस्कारों से ।
भारतेंदु के पास बाप दादा का इतना धन था कि उसके बारे में खुद भारतेंदु कहते थे कि इस धन ने मेरे बाप दादा को खाया , मैं इसे खाकर ही जाऊंगा । भारतेंदु ने धन खाया नहीं बल्कि हिंदी की सेवा में अधिक लगाया । लेखक मंडली बनाई और लेखकों की जरूरत पड़ने पर आर्थिक सहायता की । आज हालत यह है कि लेखक मंडली नहीं बनाते बल्कि अपना अपना मठ बनाते हैं , माफिया बनाते हैं और भारतेंदु नहीं बल्कि मठाधीश कहलाते हैं । आजकल के लेखकों का एक ही नारा है :
हम तुम्हें 
तुम हमें छापो । 
हम तुम्हें 
तुम हमें उछालो ।
जो हमारे मठ का नहीं 
उसे गिराओ । 
हिंदी साहित्य में से 
उसका नाम मिटाओ ,,,,
हालांकि हम सब जानते हैं कि साहित्य में नाम लिखना मठाधीशों के साथ में नहीं बल्कि पाठक के हाथ में है । 
हिंदी साहित्य में एक पूरा युग दरबारी युग रहा है । दरबारी युग यानी रीतिकाल । इस युग के कवि राजाओं को खुश करने के लिए दोहे रचते थे । इन सबमें बाजी मार ले गये बिहारी बाबा जिनके एक दोहे पर सोने की अशर्फी मिलती थी । दरबारियों की वाह वाही अलग । वैसे इसी काल में कवि भूषण भी हुए जिनकी पालकी को खुद छत्रसाल ने कंधा दिया था : 
शिवा को सराहों
 के सराहों छत्रसाल को ।
अब हम इसी तर्ज पर पूछ सकते हैं कि 
बिहारी को सराहों
 के सराहों छत्रसाल को ? 
इसीलिए तो स्वर्गीय डाॅ इंद्रनाथ मदान ने एक इंटरव्यू में चुटकी ली थी कि साधन तो बढ़ रहे हैं लेकिन साधना घट रही है । लेखक का उद्देश्य बड़ी पत्रिका से ज्यादा पैसा कमाना हो गया है । जबकि लेखक का उद्देश्य पैसे कमाना नहीं बल्कि रहती दुनिया तक नाम कमाना होता है । 
मुंशी प्रेमचंद लेखन और मजदूरी को एक ही समान समझते थे । एक बार एक आदमी उनसे मिलने आया । वे उस समय लिखने मे अर्थात् मजदूरी करने में व्यस्त थे । कुछ देर बात कर उन्होंने उस आदमी से पूछा कि यदि एक मजदूर मजदूरी नहीं करेगा तो खायेगा क्या ?
इस पर वह अतिथि बोला कि भूखा मरेगा और क्या होगा? 
मुंशी प्रेमचंद ने कहा -एक लेखक लिखेगा नहीं तो खायेगा क्या ?
 मुंशी प्रेमचंद के मजदूरी शब्द को अनेक लेखकों ने अपनाया जरूर लेकिन बड़े  गलत तरीके से । आज बुक स्टाल ऐसी पत्रिकायें से भरे पड़े हैं जो युवा वर्ग को गुमराह कर रहा है । वे बड़ी शान से कहते हैं कि हम मुंशी प्रेमचंद की तर्ज पर मजदूरी कर रहे हैं । कम पैसे के लिए अश्लील साहित्य धड़ाधड़ लिखते चले जा रहे हैं । उरोजों चुम्बकों की बात करते रहते हैं । तब मुझे ऐसे एक लेखक महोदय को याद दिलाना पड़ा कि मुंशी प्रेमचंद जहां कलम के मजदूर थे वहीं वे कलम के सिपाही भी थे । उन्होंने मुम्बई की फिल्मी दुनिया को भी ठोकर मार दी थी । वे फिल्म निर्माताओं की कहानी बदलने की मांग को पचा नही पाये और वापस आ गये । कुछेक सिक्कों के लिए मुंशी प्रेमचंद ने समाज पर अपने पहले में कोई ढील नहीं दी थी । इसीलिए वे कहते थे कि साहित्य समाज को सुलाने के लिए नहीं बल्कि जगाने के लिए है । 
दूर क्या जाना । जैसे कल की बात हो । मोहन राकेश ने जब अनिता राकेश को कहा कि देखो , मेरी ज़िंदगी में पहले स्थान पर मेरा लेखन , दूसरे पर दोस्त और तीसरे पर तुम्हारी जगह है । अगर तुम इसमें कुछ उलट पुलट करोगी तो मुसीबत में पड़ जाओगी ।
इस बात की खूब आलोचना हो रही है और हुई भी । मोहन राकेश को खानों में ब॔टा आदमी तक कहा गया । जो भी हो , वे लेखक के तौर पर ईमानदार आदमी थे । लेखक के लिए लेखन सबसे पहले स्थान पर नहीं होगा तो क्या किसी बनिए के बही खाते में होगा ? आज कितने लेखक हैं जो लेखन के लिए उचित माहौल न पाकर मोहन राकेश की तरह इस्तीफे दर इस्तीफे दे सकते हैं ? कितने लेखक हैं जो सुविधाओं के पीछे न भाग कर लेखन के लिए और लेखक बन कर बंटे रह सकते हैं ? शब्द का मोल चुकाने वाले कितने लेखक हैं ?
अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने भी द ओल्ड मैन एंड द सी उपन्यास लिखने के लिए मछुआरों के बीच समय गुजारा था । उस उपन्यास को नोबेल पुरस्कार मिला । तोल्सटाय ने वार एंड पीस उपन्यास को बी  बार से ऊपर लिखा या निरंतर संशोधित किया । ऐसा धैर्य और ऐसा त्याग किस लेखक में है या कितने लेखकों में है ? 
कहा जाता है कि विदेशों में लेखक की असली लेखन यात्रा चालीस साल के बाद शुरु होती है क्योंकि वह जीवन के अनुभव से भरपूर हो जाता है जबकि हमारे दे  में एकदम उलट हैं हालात । बहुत सारे लेखक चालीस तक पहुंचते पहुंचते मठाधीश या परामर्शदाता बन चुके होते हैं । 
एक अखबार के संपादक के पास एक नवोदित कवि आया और अपनी रचना देकर कहा कि मुझे भी कवियों की लाइन में लगा दीजिए । 
इस पर संपादक महोदय ने बहुत शानदार जवाब दिया कि बरखुरदार , लाइन तो पहले ही बहुत लम्बी लगी है  लेकिन कोई इस लाइन का नेता बन सके , उसकी इंतजार है । हो सके तो आप ही आगे आइए न । 
वे कविता बगल में दबाये दुम दुम दफा कर भाग निकले । 
कुम्हारी अपना ही भांडा सलाह तो है । लेखक अपनी ही बिरादरी की आलोचना करने को मजबूर है । और यही पूछ रहा है -क्यों नहीं आते , लेखक अच्छे अच्छे ....?