अदालत और कुत्ते

अदालत और कुत्ते

अदालत ने कहा-
‘‘रैबीज से ग्रस्त कुत्ते अब,
समाज के लिए खतरा हैं,
इसलिये उन्हें जान से 
मार देना लाजिमी होगा..”

मैं सोचता हूं - 
गलियों में भौंकते, और
खाने की खोज में दौड़ते
तथा संदिग्धों को दौड़ाने  
वाले उन कुत्तों से अधिक 
खतरनाक वे भेड़िये हैं
जो इंसानों का मुखौटा लगा
कर हमारे आस-पास रहते हैं।

ये भेड़िये रोज किसी न किसी 
घर को उजाड़ देते हैं,
कभी अबलाओं की 
आबरू लूट लेते हैं,
तो कभी उनकी रूह पर 
वार कर उन्हें -
बुरी तरह नोच डालते हैं।

ये लोग जहर फैलाते हैं, 
घृणा के बीज बोते हैं,
राजनीति चमकाने के लिये
घटिया स्तर पर उतर आते हैं

कभी धर्म के नाम पर,
कभी जाति की आग में,
कभी झूठी शान के लिये
तो कभी झूठ की चमकती 
तलवार से, तो कभी 
भूख एवं डर की राजनीति से।

उनकी आंखों में- 
पागलपन दौड़ता है, वे
इंसानियत की हत्या करते हैं,
और समाज धीरे-धीरे
रैबीज के मरीज की तरह
छटपटाने लगता है।

लेकिन इंसान रूपी 
उन भेड़ियों  पर कोई 
आदेश नहीं आता,
कोई यह नहीं कहता —
“ये समाज के लिए घातक हैं”

क्योंकि उनके पीछे
सत्ता खड़ी हैं,
राजनीतिक हाथ 
उनके  सिर पर है, और 
वोटों की गिनती
उनके हर अपराध को 
माफ कर देती है।

कुत्ते इसलिए मरेंगे
क्योंकि वे वोट नहीं 
डालते, उनके पक्ष में 
कोई रैली नहीं होती,
कोई नेता उनकी 
जाति नहीं पूछता,
कोई मंच उनके लिए 
नारे नहीं लगाता।

वे सिर्फ आवारा हैं,
और हमेशा कहे जाते हैं,

इस व्यवस्था में
सबसे सस्ता जीवन
उन्हीं का होता है
जिनके पास कोई 
संरक्षक नहीं होता।

काश…
कभी उन चेहरों को भी 
पहचाना जाता,जो 
मुस्कुराते समाज में 
नफरत का कोरोना छोड़ते हैं।

कानून उन जहरीली 
अरवाह तक भी पहुंचता
जो इंसानों को 
जिंदा लाश बना देते हैं।

तो शायद किसी गली में 
कोई कुत्ता नहीं,
बल्कि इंसानियत
निर्भय होकर जी रही होती।

टी शशिरंजन