भगवंत मान और ज़ेलेंस्की में तीन बड़ी समानताएं हैं

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की के बीच कौन-कौन सी तीन समानताएं हैं? पहली तो यह कि दोनों अपने राजनीतिक कॅरियर से पहले हास्य अभिनेता थे।

भगवंत मान और ज़ेलेंस्की में तीन बड़ी समानताएं हैं

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की के बीच कौन-कौन सी तीन समानताएं हैं? पहली तो यह कि दोनों अपने राजनीतिक कॅरियर से पहले हास्य अभिनेता थे। दूसरी समानता यह कि दोनों युवा और जोशीले हैं। तीसरी, यह कि दोनों को समय का महत्व पता है। युद्ध में फंसे ज़ेलेंस्की को एक एक दिन की अहमियत मालूम है, तो भगवंत मान ने पद की शपथ लेते ही कह दिया कि हमें एक भी दिन व्यर्थ नहीं जाने देना है, क्योंकि हम पहले ही 70 साल पिछड़ गए हैं। अगर मान अपनी बात के पक्के निकले तो यह संकल्प पंजाब के लिए उपयोगी साबित होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि शिरोमणि अकाली दल ने अगर पंजाब को बीमार बनाया, तो कांग्रेस ने अपनी खींचतान और मूर्खताओं से प्रदेश को आईसीयू में पहुंचा दिया। तभी तो जनता ने दोनों की छुट्‌टी करके नए खिलाड़ियों को गड्‌डी सौंप दी। उम्मीद करनी चाहिए कि आगे सब अच्छा होगा और नई टीम पंजाब को फिर से रंगीला बना देगी।
 
रंग में भंग करने का काम तो वैसे कुछ शैतानी ताकतें कर रही हैं, जिन्होंने दक्षिण की नासमझ लड़कियों को फुसला कर हिजाब का बखेड़ा खड़ा किया है। वरना स्कूली लड़कियों का इस तरह के विवाद से क्या लेना देना? कर्नाटक हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कहा है कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। यह बात दुनिया के कई देश पहले ही मान चुके हैं। इसीलिए डेनमार्क, कनाडा, जर्मनी, बुल्गारिया, फ्रांस, स्विटजरलैंड, नीदरलैंड, बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, इटली, रूस और चीन में हिजाब प्रतिबंधित है। इन देशों में शिक्षा संस्थानों में किसी भी तरह के धार्मिक पहनावे पर रोक है। मिस्र और सीरिया जैसे इस्लामिक देशों में भी शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने पर रोक है। आपको बता दें कि मिस्र में 90 प्रतिशत और सीरिया में 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। सीरिया ने अपने यहां 2010 में और मिस्र ने 2015 में हिजाब को प्रतिबंधित किया था। हिजाब का हिसाब किताब पक्का कोई क्षुद्र राजनीतिबाज या पाक परस्त कर रहा है, जो लड़कियों की पढ़ाई लिखाई को भी खटाई में डाल रहा है। शिक्षा संस्थानों में सिर्फ पढ़ाई होनी चाहिए, इस तरह बेसिर पैर के बखेड़े नहीं।
 
इस बार की होली पिछले दो सालों से इस मायने में अलग होगी कि अबकी अदृश्य वायरस का उतना हौवा नहीं है। जीवन की गाड़ी पटरी पर लौट रही है, भले ही अभी सारे रंग खिलने में कुछ महीने का और वक्त लगेगा। सड़कों पर रंगे पुते लोग घूमेंगे इसकी संभावना भी कम ही है। जिसने दो साल से किसी से हाथ न मिलाया हो वह यकायक किसी से तपाक से कैसे गले मिल पाएगा, यह भी देखने वाली बात होगी। सर्दियां जा चुकी हैं तो इस बात का सुकून है कि रंग खेलने वालों को रंग मिले ठंडे पानी से खास परहेज नहीं होगा। होली पर इस बात का सबको ख्याल रखना होगा कि कोई बच्चा भी किसी जानवर पर रंग न डाले। रंगों में मिले कैमिकल जानवरों की त्वचा में एलर्जी पैदा कर सकते हैं और रंग उनकी आंखों को नुकसान पहुंचा सकते हैं। हम आप तो होली खेलने के बाद नहा धो लेते हैं, लेकिन जानवरों को रंग छुड़ाने की सुविधा नहीं होती। आप भी अपना ख्याल रखिए। हैप्पी होली। 


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार व कॉलमिस्ट हैं)