समाचार विश्लेषण /किसान आंदोलन और मुआवजे का संबंध क्या है?

फसलों को खराब मौसम ने बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । कहते हैं कि दाता की मर्जी ! खुद पच्चीस साल खेती से जुडा रहा । सारी मेहनत और फसल ऊपरवाले के रहम पर ही घर तक आती है । इसीलिये मैंने एक लघुकथा में कहा भी की किसान का क्या बस है ! तम्बू थोड़े ही तान सकते हैं किसान अपनो फसलों पर ! इसके बावजूद अन्नदाता हौसला नहीं हारते और नयी फसल की तैयारी शुरू कर देते हैं ! इसके सिवा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं ! 

समाचार विश्लेषण /किसान आंदोलन और मुआवजे का संबंध क्या है?
कमलेश भारतीय।

-*कमलेश भारतीय 
फसलों को खराब मौसम ने बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । कहते हैं कि दाता की मर्जी ! खुद पच्चीस साल खेती से जुडा रहा । सारी मेहनत और फसल ऊपरवाले के रहम पर ही घर तक आती है । इसीलिये मैंने एक लघुकथा में कहा भी की किसान का क्या बस है ! तम्बू थोड़े ही तान सकते हैं किसान अपनो फसलों पर ! इसके बावजूद अन्नदाता हौसला नहीं हारते और नयी फसल की तैयारी शुरू कर देते हैं ! इसके सिवा कोई दूसरा चारा भी तो नहीं ! 
इस साल फिर मौसम का मिजाज बिगड़ गया और बेमौसम ही बादल बरसे भी , गरजे भी और औलावृष्टि भी जमकर हुई । इस तरह खेतों में से सोना घर आने से पहले ही राख में बदल गया ! किसानों के चेहरे मुर्झा गये ! सही गीत याद आता है : 
छेती छेती पक नीं कनके 
धीयां दा ब्याह रखिया! 
धीयां ते कनकां दी इक्को जिही रूत बे ! 
धीयां दा ब्याह रखिआ ! 
पर मौसम और दाता को कौन समझाये , कौन बताये ! इस तरह किसानों की बर्बाद हुई फसल पर सरकार का नायाब दिला रहा है विपक्ष ! सरकार ने कुछ कदम तो उठाये हैं लेकिन ये कदम काफी नहीं हैं ! 
बताया जा रहा है कि हर किसान को फ़सल की बिजाई के बाद उसका पूरा विवरण....यानी किस किला नम्बर में क्या बीजा गया है... हरियाणा सरकार के पोर्टल 'मेरी फ़सल मेरा ब्योरा' पर दर्ज/अपलोड करना होता है। इसके तुरन्त पश्चात् सम्बंधित पटवारी/तहसीलदार आदि द्वारा इस विवरण को पोर्टल पर सत्यापित कर दिया जाता है और यह कार्य फ़सल तैयार होने से काफ़ी पहले ही पूर्ण कर लिया जाता है ताकि ख़रीद में विलम्ब न हो । अभी तक ये प्रक्रिया सामान्य रूप से चल रही थी, लेकिन इस दफ़ा...रबी 2023 की फ़सलों... सरसों और गेहूं की बिजाई का सत्यापन ही नहीं किया गया । सत्यापन को इस कारण अनिवार्य किया गया था ताकि अन्य प्रदेशों की फ़सलें हरियाणा की मंडियों में लाकर न बेची जा सकें । एम एस पी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य पर किसान अपना उत्पाद तभी बेच सकता है जब उसने बिजाई का विवरण 'मेरी फ़सल मेरा ब्योरा' पर अपलोड किया हो और उसका सत्यापन भी हो चुका हो।
अब आलम यह कि सरसों लगभग पूरी तरह कट चुकी है और निकल भी चुकी है लेकिन मंडियों में ख़रीद नहीं हो रही क्योंकि सत्यापन ही नहीं हुआ। सरसों का एम एस पी है रु 5450/- प्रति क्विंटल। परिणामस्वरूप किसान मजबूर है प्राइवेट ख़रीददारों /मिल मालिकों को बेचने पर औने पौने दामों पर...रु 5000/- फ़ी क्विंटल या उससे भी कम दामों पर !
उधर मौसम परिवर्तन का असर तो पूरी दुनिया पर है... हरियाणा पर भी इन्द्र देव मेहरबान रहते हैं..बार बार के पश्चिमी विक्षोभ की मार झेल रही हैं खेतों में तैयार खड़ी फ़सलें और लुट रहा है किसान। 
अब गेहूं पककर कटने को तैयार है, मंडियों में भी ख़रीद की तैयारियों का ख़ूब डंका पीटा जा रहा है लेकिन अन्दरख़ाने किसान की बरबादी का पूरा इन्तज़ाम कर रखा है हरियाणा की सरकार ने, क्योंकि न सत्यापन का नाटक पूर्ण होगा और न ही बिक पाएगी फ़सल । अल्लाह मियां के रहमो करम पर है किसान अब । 
इस तरह की व्यथा है हर किसान की ! कैसे भरपाई होगी अन्नदाता की ? सरकार विचार करे और कुछ आवश्यक कदम उठाये ! कोई आवश्यक कदम व गंभीरता न दिखाने पर ऐसा लगता है जैसे किसान आंदोलन की सजा किसानों को अप्रत्यक्ष रूप से दी जा रही है ! 
-*पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।