शादी की एल्बम

मनोज धीमान द्वारा लिखित एक कहानी

शादी की एल्बम
लेखक मनोज धीमान।

जैसा की हरेक व्यक्ति अपनी शादी की एल्बम देखने का इच्छुक होता है, सुरेश भी अपने विवाह की एल्बम देखने के लिए आतुर था। शादी के बाद उसने फोटोग्राफर को कई बार फ़ोन मिलाया और पूछा -"क्या मेरी शादी की एल्बम बन कर तैयार हो गई है?" 
"जी नहीं जनाब, अभी कुछ काम शेष रहता है। जैसे ही एल्बम तैयार होगी मैं स्वयं आपके घर पहुंचा दूंगा। आप बिलकुल भी चिंता मत कीजिये।" फोटोग्राफर ने उत्तर दिया।

"अरे क्या करते हो, हर बार यही रटा-रटाया उत्तर देते हो। सुरेश ने थोड़ा खीझ निकालते हुए कहा। आख़िर कब मुकम्मल होगा काम, मैं तो एल्बम देखने को आतुर हो गया हूँ। पिछले बीस दिनों से तुम मुझे यही सब कुछ कह रहे हो। अब ये "लारा-लप्पा" लगाना बंद करो और एल्बम जल्दी से तैयार करके मुझे दो, मेरी पत्नी भी मुझ से कई बार एल्बम के बारे में पूछ चुकी है। घरवाले, दोस्त-रिश्तेदार सभी पूछ रहे हैं। हर कोई अपनी-अपनी तस्वीर देखने को बेसब्र हुआ पड़ा है। और एक तुम हो कि तारीख़ पर तारीख़ दिए जा रहे हो।
आख़िर वो दिन आ ही गया। शादी की एल्बम सुरेश के हाथों में थी। एक-एक चित्र को कई-कई बार देखा। फिर भी उसका मन नहीं भर रहा था। एल्बम देख कर ख़त्म करता तो दोबारा देखने को मन करता। कई बार एल्बम अकेले ही देखी। पत्नी के साथ, परिवार के साथ, रिश्तेदारों के साथ, मित्रों के साथ। बच्चे होने के बाद भी उसने एल्बम को कई बार देखा। एल्बम दिखाते हुए उंगली रख कर बच्चों को तस्वीरों में नज़र आ रहे रिश्तेदारों, दोस्तों इत्यादी के बारे में बताता चला जाता था। 
समय का पहिया धूमा तो सुरेश ज़िन्दगी की दौड़ में धीरे-धीरे एल्बम को भूल सा गया। ना कभी उसकी पत्नी ने, ना उनके बच्चों ने और ना ही किसी और ने कभी शादी की एल्बम का ज़िक्र किया। बरसों यूं ही बरसों बीत गए। एक दिन दिवाली के मौके पर घर की सफाई करते समय सुरेश के हाथ में उसकी शादी की एल्बम आ गई। एल्बम धुल से भरी हुई थी। कभी चमचमाती तस्वीरें धूंधली सी पड़ चुकी थीं। तस्वीरों का आकर्षण मानों ख़त्म हो चुका था। सुरेश ने एल्बम के पन्ने पलटने शुरू किये। तस्वीरों में दिखाई दे रहे बहुत सारे रिश्तेदार, मित्र व जान-पहचान के लोग अब इस धरती पर नहीं रहे थे। वे सभी लोग इस संसार से विदा हो चुके थे। जबकि बहुत सारे लोग अपनी सांसारिक यात्रा के अंतिम पड़ाव पर थे। सुरेश को एल्बम की तस्वीरों में अपना भविष्य भी स्पष्ट दिखाई देने लगा था। उसने ख़ामोशी से गर्द से भरी उस एल्बम को वहीं रख दिया जहाँ से उसे उठाया था। 
-मनोज धीमान 
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