तुम नहीं हो मेरी कविता/अश्विनी जेतली 'प्रेम'

तुम नहीं हो मेरी कविता/अश्विनी जेतली 'प्रेम'

कैसे करूं विश्वास 
कि तुम कविता हो
कि तुम ही हो मेरी कविता

उदास सी
मुरझाई सी
जिसके दामन में
जिसके किसी भी शब्द में
नहीं है मेरे लिए खुशी का एक भी अहसास
कि जिसके हर मिसरे में
छुपी है बस 
मेरी तन्हाइयों की परछाईं-सी
रुदन से भरी
बिरहा से लदी,
नहीं तुम नहीं हो कविता
तुम हो ही नहीं सकती मेरी कविता

मेरी कविता तो थी
मेरे वजूद को महका देने वाली
खिलौना टूट जाने पर जब बचपन में
रोया करता था मैं
सोया नहीं करता था मैं
तो मुझे 
ममता की लोरी बन 
सुला देने वाली,
वो थी मेरी कविता
नहीं तुम नहीं हो
 
मेरी कविता तो
मेरी कल्पना से भी थी हसीन
कि जब ऑफिस से दिन भर 
फ़ाइलों को खंगाल कर
शाम को थका-हारा 
घर लौटता
तो अपने होने के महकते अहसास को 
मेरे भीतर उंडेल कर
मेरी थकान मिटा देने वाली

मेरी कविता तो वो थी जो स्कूल से लौटने पर 
बैग को आंगन में फेंक
लपक कर मेरे सीने से लगती  
उसे छप्पन इंच का कर देती थी 
मेरी कविता तो वो थी
तुम नहीं हो मेरी कविता