‘कृषि विषयक रचनात्मक लेखन’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न

‘कृषि विषयक रचनात्मक लेखन’ पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला संपन्न

अमृतसर, 13 फरवरी, 2026: गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी-विभाग द्वारा कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र (RUSA 2.0) के सहयोग से ‘कृषि विषयक रचनात्मक लेखन’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का सफल आयोजन 11–12 फरवरी, 2026 को विश्वविद्यालय के यशस्वी उप-कुलपति प्रो.(डॉ.) करमजीत सिंह के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से किया गया।
इस खूबसूरत कार्यक्रम का संयोजन प्रो. सुनील शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी विभाग एवं अधिष्ठाता, भाषा संकाय द्वारा किया गया।
दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला के पहले दिन (11 फरवरी) के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता पद्मश्री प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी (कुलाधिपति, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला) ने की। उन्होंने कृषि जीवन की सांस्कृतिक और साहित्यिक अभिव्यक्ति की आवश्यकता पर बल दिया। विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील शर्मा ने कार्यशाला की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कृषि और साहित्य के अंतर्संबंधों पर प्रकाश डाला। उद्घाटन वक्तव्य प्रो. इंदु वीरेंद्रा (जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली) ने दिया। अपने वक्तव्य में प्रो.इंदु वीरेंद्रा ने किसान को केंद्र में रखकर रचे गये हिंदी साहित्य और फिल्मों के माध्यम से कृषक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। मुख्य अतिथि प्रो. प्रताप कुमार (कृषि विभाग एवं समन्वयक, कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर) रहे। डॉ. प्रताप कुमार ने गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के कृषि, अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान पर प्रकाश डालते हुए केंद्र की स्थापना और उसके उद्देश्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला।
कार्यशाला के प्रथम तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. कामराज सिंह (हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़) ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि 'कृषि विषयक रचनात्मक लेखन’ कार्यशाला किसानों के जीवन, संघर्ष और नवाचारों को साहित्य से जोड़ती है। यह प्रतिभागियों में संवेदनशीलता, सामाजिक उत्तरदायित्व और अभिव्यक्ति कौशल विकसित करती है। साथ ही, कृषि-चेतना को सशक्त कर ग्रामीण यथार्थ को रचनात्मक विमर्श के केंद्र में लाती है। मुख्य अतिथि डॉ. शोभा रानी (हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. सौरभ कुमार (सतीश धवन राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, लुधियाना) रहे।

द्वितीय तकनीकी सत्र की अध्यक्षता डॉ. विनोद बब्बर (संपादक, राष्ट्र किंकर, नई दिल्ली) ने की। उन्होंने कहा कि कृषि-आधारित रचनात्मक लेखन समाज को अन्नदाता के श्रम का मूल्य समझाने, पर्यावरण-संतुलन के प्रति जागरूक करने और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बनता है। मुख्य अतिथि डॉ. अमरजीत दयाल (लायलपुर महिला खालसा कॉलेज, जालंधर) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. कुलभूषण शर्मा (पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा) रहे। विभिन्न शोधार्थियों एवं प्रतिभागियों ने कृषि विमर्श से संबंधित शोध-पत्र प्रस्तुत किए। वरिष्ठ साहित्यकार श्री शांति कुमार स्याल ने प्रेमचंद की रचनाओं के परिप्रेक्ष्य में अपना प्रपत्र प्रस्तुत किया।

राष्ट्रीय कार्यशाला के दूसरे दिन (12 फरवरी) के पहले तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. मनजिंदर सिंह (पंजाबी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर) ने की। उन्होंने कहा कि कृषि विषयक रचनात्मक लेखन की आवश्यकता इसलिए है कि यह किसानों के जीवन, संघर्ष, नवाचार और समस्याओं को संवेदनशीलता के साथ समाज तक पहुँचाता है। इससे कृषि के प्रति जागरूकता बढ़ती है, नई पीढ़ी में रुचि उत्पन्न होती है और ग्रामीण भारत की वास्तविकताओं को अभिव्यक्ति मिलती है। मुख्य अतिथि डॉ. मलकीत सिंह (हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. अरुणा पाठक (बी.एल.एम. महिला महाविद्यालय, नवांशहर) रहीं।

दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता पंजाब प्रदूषण बोर्ड के पूर्व चेयरमैन प्रो. आदर्शपाल विग ने की। उन्होंने पंजाब में किसानों की स्थिति, कृषि विषयक नीतियों, उपलब्धियों सहित पर्यावरण की स्वच्छता के संकल्प पर विशेष बल दिया। मुख्य अतिथि डॉ. परषोतम कुमार (जम्मू विश्वविद्यालय, जम्मू) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. कुलविंदर कौर (हिंदू कन्या महाविद्यालय, कपूरथला) रहीं।

समापन सत्र की अध्यक्षता प्रो. विनोद तनेजा (पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर) ने की। प्रो. विनोद कुमार तनेजा ने कृषि विषयक पत्रकारिता से प्रतिभागियों को अवगत कराया तथा कहा कि कृषि विषयक रचनात्मक लेखन केवल खेती-किसानी का विवरण नहीं, बल्कि भूमि, किसान और प्रकृति के जीवंत संबंधों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति है। इसमें बीज, मिट्टी, पानी, श्रम, ऋतुचक्र और फसल के साथ जुड़ी मानवीय संवेदनाएँ उभरती हैं। यह लेखन ग्रामीण जीवन की संघर्षगाथा, आशा, परंपरा और नवाचार को शब्द देता है। मुख्य अतिथि डॉ. सुरजीत कौर (खालसा कॉलेज, अमृतसर) रहीं तथा विशिष्ट अतिथि (श्री जगमोहन सिंह, चेयरमैन, इंडो ग्लोबल एनजीओ फॉरम) ने की।

दोनों दिनों में पत्र-प्रस्तुति, संवाद एवं विमर्श के माध्यम से कृषि जीवन, किसान संवेदना, पर्यावरणीय संकट, ग्रामीण संस्कृति और समकालीन साहित्य में कृषि की अभिव्यक्ति पर गंभीर चर्चा हुई।

कार्यक्रम के सफल संचालन में शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों की सक्रिय भूमिका रही। अंत में हिंदी विभाग के अध्यक्ष और कार्यशाला-संयोजक प्रो. सुनील शर्मा ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों एवं सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। कार्यशाला में मैडम पिंकी शर्मा, डॉ. सपना शर्मा, डॉ. लवलीन कौर, डॉ. नेहा हंस, डॉ. विशाल भारद्वाज, डॉ. हरजीत सिंह ग्रोवर, गुरशरण कौर ग्रोवर, डॉ. सलोनी, डॉ. मोहन कुमार, मैडम सुनयना, डॉ. राजकुमार, डॉ. विकास जोशी, मैडम रमनदीप कौर, करन सिंह, डॉ. हरप्रीत सिंह, श्री रजनीश भारद्वाज, नरेश कुमार, योगेश कुमार, डॉ. विकास, मैडम निधि, दीपक शर्मा,  राकेश कुमार आदि की विशेष उपस्थिति रही।

प्रो. सुनील शर्मा ने कार्यशाला में विद्यार्थियों को प्रतिभागिता के लिए डीएवी वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, अमृतसर के प्राचार्य श्री विकास पराशर, डी.आर. माडर्न वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, अमृतसर के प्राचार्य रविंद्र पठानिया और माधव विद्या निकेतन, अमृतसर की प्राचार्या मैडम रीना का आभार प्रकट किया। उन्होंने कार्यशाला के सफल आयोजन के लिए राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA 2.0) के समन्वयक डॉ. हरमिंदर सिंह, कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के समन्वयक डॉ. प्रताप कुमार सहित विश्वविद्यालय-प्रशासन का आभार जताया।

यह कार्यशाला कृषि और साहित्य के समन्वित अध्ययन की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुई, जिससे रचनात्मक लेखन के क्षेत्र में नए आयाम खुलने की संभावनाएँ प्रबल हुई हैं।