“21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच : चुनौतियाँ और संभावनाएँ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी-विभाग एवं ड्रामा क्लब के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान 2.0 के अंतर्गत कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के सहयोग से 24–25 फरवरी, 2026 को “21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच : चुनौतियाँ और संभावनाएँ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया।

“21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच : चुनौतियाँ और संभावनाएँ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन

गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी-विभाग एवं ड्रामा क्लब के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान 2.0 के अंतर्गत कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के सहयोग से 24–25 फरवरी, 2026 को “21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच : चुनौतियाँ और संभावनाएँ” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया।
संगोष्ठी का संयोजन प्रो. सुनील कुमार ‘वत्स’, अध्यक्ष, हिंदी-विभाग एवं अधिष्ठाता, भाषा-संकाय ने किया। उन्होंने स्वागत उद्बोधन और संगोष्ठी का परिचय देते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के यशस्वी उप-कुलपति प्रो. करमजीत सिंह के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से हिंदी विभाग द्वारा निरंतर साहित्यिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है। प्रो. सुनील ने कहा कि 21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच परिवर्तन के एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद निरंतर जारी है। यदि हम हिंदी रंगमंच की यात्रा को देखें तो भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर मोहन राकेश, धर्मवीर भारती और भीष्म साहनी तक एक सशक्त परंपरा दिखाई देती है। इसी परंपरा की पृष्ठभूमि में 21वीं सदी का रंगमंच अपने नए स्वरूप और सरोकारों के साथ उभर रहा है।
उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल के अध्यक्ष प्रो. विक्रम संधु ने की तथा उद्घाटन वक्तव्य प्रो. दर्शन पांडेय (राजधानी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने दिया। प्रो. विक्रम संधु ने कहा कि आज का दर्शक सिनेमा, वेब सीरीज़ और सोशल मीडिया की ओर अधिक आकर्षित है। नेटफ्लिक्स, यूट्यूब जैसे मंचों ने मनोरंजन के स्वरूप को बदल दिया है। परिणामस्वरूप रंगमंच के दर्शकों की संख्या प्रभावित हुई है। अपने वक्तव्य में प्रो. दर्शन पांडेय ने कहा कि स्त्री लेखन और हाशिए के समाजों की अभिव्यक्ति ने हिंदी नाटक को नई दृष्टि दी है। अब नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक प्रतिरोध का सशक्त साधन बन रहा है। छोटे शहरों और कस्बों में उभरते रंग-समूह इस बात का प्रमाण हैं कि हिंदी रंगमंच की ऊर्जा महानगरों तक सीमित नहीं है। मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. अजय शर्मा (जालंधर) उपस्थित रहे। उन्होंने बताया कि वैश्वीकरण, बाजारवाद, स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, पर्यावरण संकट, प्रवासी जीवन, और पहचान के प्रश्न—इन सभी जटिल मुद्दों को नाटक में प्रभावी रूप से प्रस्तुत करना आज के नाटककार के लिए एक गंभीर दायित्व है। विशिष्ट अतिथि राजिंदर सिंह, निदेशक, दस्तक थिएटर, अमृतसर थे। राजिंदर सिंह ने कहा कि हिंदी नाटक और रंगमंच की परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है। भारतेंदु युग से लेकर आधुनिक काल तक हिंदी रंगमंच ने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्नों को मंच पर सशक्त रूप से प्रस्तुत किया है। 21वीं सदी में प्रवेश करते ही तकनीकी क्रांति, वैश्वीकरण और बदलती जीवनशैली ने हिंदी नाटक और रंगमंच के सामने नई चुनौतियाँ और संभावनाएँ दोनों उपस्थित की हैं। सत्र का संचालन मुकेश कुमार ने तथा धन्यवाद ज्ञापन सुश्री भव्या ने किया।
इसके उपरांत प्रथम तकनीकी सत्र आयोजित हुआ, जिसकी अध्यक्षता प्रो. बृजेश कुमार पांडेय (इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज) ने की। उन्होंने कहा कि चुनौतियों के बीच संभावनाओं का विस्तृत आकाश भी उपस्थित है। 21वीं सदी का हिंदी रंगमंच प्रयोगधर्मिता की ओर अग्रसर है। नए निर्देशक और रंगकर्मी पारंपरिक रंग-शैलियों को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ रहे हैं। प्रकाश, ध्वनि, मल्टीमीडिया और डिजिटल प्रोजेक्शन का समावेश रंगमंच को अधिक प्रभावी बना रहा है। मुख्य अतिथि डॉ. अरविंदर सिंह चमक (इंडियन अकैडमी ऑफ फाइन आर्ट्स, अमृतसर) रहे। डॉ. चमक ने कहा कि वैश्वीकरण के कारण हिंदी नाटक का अन्य भाषाओं और देशों के रंगकर्म से संवाद बढ़ा है। अनुवाद और अंतरराष्ट्रीय रंगोत्सवों के माध्यम से हिंदी रंगमंच को नई पहचान मिल रही है। प्रमुख उपस्थिति डॉ. मुकेश कुमार मिरोठा (जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. नीलू शर्मा (गुरु नानक भाई लालो रामगढ़िया महिला महाविद्यालय, फगवाड़ा) थीं। डॉ. मुकेश कुमार मिरोठा ने कहा कि प्रकाश, ध्वनि, मल्टीमीडिया और डिजिटल प्रोजेक्शन के प्रयोग से रंगमंच अधिक प्रभावशाली बना है। ऑनलाइन थिएटर और हाइब्रिड प्रस्तुतियाँ नई दिशा दे रही हैं। डॉ. नीलू शर्मा ने कहा कि 21वीं सदी हिंदी नाटक के लिए संघर्ष और सृजन—दोनों का युग है। सत्र-संचालन डॉ. नेहा हंस ने तथा धन्यवाद ज्ञापन श्री राहुल कुमार ने किया।
दूसरे तकनीकी सत्र की अध्यक्षता प्रो. वंदना भल्ला, निदेशक (शोध), गुरु नानक देव विश्वविद्यालय ने की। उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि 21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच संक्रमण के इस दौर में आत्ममंथन और नवाचार—दोनों की मांग करता है। परंपरा से शक्ति लेते हुए और समकालीन यथार्थ से संवाद करते हुए हिंदी रंगमंच निश्चय ही नई ऊंचाइयों को प्राप्त कर सकता है। मुख्य अतिथि प्रो. राजेंद्र कुमार (पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा) रहे। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों और साहित्यिक संस्थानों में रंगमंचीय गतिविधियों की सक्रियता भी एक सकारात्मक संकेत है। युवा रंगकर्मी लोकनाट्य परंपराओं—नौटंकी, स्वांग, भवाई आदि—को समकालीन संदर्भों में पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। इससे रंगमंच की जड़ें भी मजबूत हो रही हैं और नवीनता भी बनी हुई है।प्रमुख उपस्थिति प्रो. चंद्रकांत सिंह (हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला) तथा विशिष्ट अतिथि डॉ. बृजेंद्र कुमार (लवली प्रोफेशनल विश्वविद्यालय, फगवाड़ा) थे। प्रो. चंद्रकांत सिंह ने कहा कि स्त्री लेखन और हाशिए के समाजों की अभिव्यक्ति ने हिंदी नाटक को नई दृष्टि दी है। अब नाटक केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और वैचारिक प्रतिरोध का सशक्त साधन बन रहा है। छोटे शहरों और कस्बों में उभरते रंग-समूह इस बात का प्रमाण हैं कि हिंदी रंगमंच की ऊर्जा महानगरों तक सीमित नहीं है। डॉ. बृजेंद्र कुमार ने कहा कि यदि रंगकर्मी सामाजिक सरोकार, तकनीकी दक्षता और रचनात्मक प्रयोगधर्मिता को संतुलित करें, तो हिंदी रंगमंच न केवल अपनी प्रासंगिकता बनाए रखेगा, बल्कि नई ऊँचाइयों को भी प्राप्त करेगा। अतिथि वक्ता के रूप में प्रसिद्ध रंगमंच कलाकार श्री गुरिन्द्र सिंह मकना (मोहाली) ने अपने विचार प्रस्तुत किए। मकना ने कहा कि रंगकर्मी सीमित साधनों में कार्य करते हैं। सरकारी और गैर-सरकारी सहयोग का अभाव, प्रायोजन की कमी तथा स्थायी रंगमंचीय संरचनाओं का अभाव हिंदी रंगमंच की गति को बाधित करता है। सत्र का संचालन सुश्री लवली ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सुश्री प्रिया ने किया।
समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. संजीव डावर (आर.के. आर्य महाविद्यालय, नवांशहर) ने की। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यम भी केवल चुनौती नहीं, अवसर भी है। ऑनलाइन मंचन, रिकॉर्डेड प्रस्तुतियां और सोशल मीडिया प्रचार के माध्यम से रंगमंच व्यापक दर्शक-वर्ग तक पहुंच सकता है। यदि तकनीक का समुचित उपयोग किया जाए तो हिंदी रंगमंच वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान और प्रभाव स्थापित कर सकता है। मुख्य अतिथि डॉ. विनोद कुमार (पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़) रहे। डॉ. विनोद कुमार ने कहा कि 21वीं सदी का हिंदी नाटक और रंगमंच संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। एक ओर डिजिटल युग की चुनौतियाँ हैं, तो दूसरी ओर नवाचार और वैश्विक संवाद की अपार संभावनाएँ हैं। इस सत्र में प्रमुख उपस्थिति डॉ. विशाल शर्मा (खालसा कॉलेज, अमृतसर) की रही। डॉ. विशाल शर्मा ने कहा कि लोकनाट्य परंपराएँ—नौटंकी, स्वांग, भवाई आदि—आधुनिक प्रयोगों के साथ पुनर्जीवित हो रही हैं। इससे भारतीयता की जड़ों से जुड़ाव बना है। विशिष्ट अतिथि के रूप में श्री कंवल रंधेय, निदेशक, आवाज रंगमंच टोली, मोहाली उपस्थित रहे। श्री कंवल रंधेय ने कहा कि 21वीं सदी का हिंदी नाटक स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी प्रश्न, पर्यावरण, प्रवासी जीवन और राजनीतिक विडंबनाओं जैसे समकालीन विषयों को मंच पर ला रहा है। इससे नाटक की प्रासंगिकता बढ़ी है। सत्र का संचालन श्री अभिजीत सिंह तोमर ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सुश्री बेदिका ने प्रस्तुत किया। डॉ. मंजुला शर्मा, डॉ. रश्मि, श्री रमन कुमार शर्मा ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। मैडम मीनाक्षी मेहरा, डॉ. रेणु शर्मा, डॉ. आत्मा राम, श्री जसवंत सिंह, मैडम सुनयना और मैडम रमनदीप कौर ने अपने फीडबैक प्रस्तुत किए।
दो दिवसीय संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों एवं संस्थानों से आए विद्वानों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की। वक्ताओं ने 21वीं सदी के हिंदी नाटक और रंगमंच के समक्ष उपस्थित चुनौतियों—प्रौद्योगिकी, दर्शक-वर्ग, बाज़ारवाद तथा वैश्वीकरण—पर गंभीर विचार-विमर्श किया तथा संभावनाओं के नए आयामों को रेखांकित किया।
कार्यक्रम के अंत में विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार'वत्स' ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों, शोधार्थियों एवं सहयोगी सदस्यों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने विशेष सहयोग के लिए डॉ. हरमिंदर सिंह, डॉ. प्रताप कुमार, डॉ. सतनाम सिंह दयोल सहित विश्वविद्यालय प्रशासन का आभार प्रकट किया। इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में हिंदी विभाग के अध्यापकों मैडम पिंकी शर्मा, डॉ. लवलीन कौर, डॉ. सपना शर्मा, डॉ. नेहा हंस व  शोधार्थियों और विद्यार्थियों सहित विदेशी भाषाएं विभाग, शारीरिक शिक्षा विभाग, यूनिवर्सिटी बिजनेस स्कूल, सोशल साइंस विभाग तथा खालसा कॉलेज, अमृतसर के रंगमंच विभाग के विद्यार्थियों की सशक्त उपस्थिति रही। संगोष्ठी ने हिंदी रंगमंच के समकालीन परिदृश्य पर सार्थक संवाद स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।