कविता/तुम्हारी बेचैनी .../टी शशिरंजन

कविता/तुम्हारी बेचैनी .../टी शशिरंजन

कविताओं में
तुम्हारी बेचैनी 
साफ-साफ 
नजर आ रही है,
और तुम्हारा प्यार भी...
मुझे खो देने का डर
तुम्हारी हर खामोशी में
धीरे-धीरे बोल रहा है।

तुम लफ्जों से कम,
और 
अपनी निगाहों से 
ज्यादा कहते हो,
जैसे हर बार 
मुझे देखते हुए
वक्त से 
एक और मोहलत
मांग लेते हो।

तुम्हारा यूं बार-बार, 
मेरी तरफ देखना,
बेवजह मेरी 
खैरियत पूछना,
मेरी छोटी-सी 
खामोशी पर--
अंदर ही अंदर, 
बिखर जाना—
ये इश्क की 
वही भाषा है,
जिसे कोई 
ज़ुबान नहीं चाहिए।

मुझे मालूम है,
तुम्हें डर सिर्फ 
मेरे जाने का नहीं,
उस एहसास के 
खो जाने का है
जो तुम्हारी रूह को
मेरे नाम से 
सुकून देता है।

लेकिन सुनो...
मुहब्बत अगर 
हर पल 
खो देने के 
डर में जीने लगे,
तो वह अपने ही हाथों
सबसे खूबसूरत 
लम्हे खो देती है।

और याद रखना—
जिस रिश्ते की जड़ें
वफा की मिट्टी में हों,
उसे आंधियां 
डराती नहीं,
बस थोड़ा और 
मजबूत कर जाती हैं।

तुम्हारी बेचैनी 
साफ साफ नजर
आती है शब्दों में,
और तुम्हारा प्यार भी...

अब बस इतना कर दो—
मुझे खोने के 
डर से नहीं,
मुझे पा लेने के 
यकीन से,
अपनी
कविताओं में ही
चाहे 
मेरा हाथ थाम लो।

टी शशिरंजन