हिंदी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, पंजाब के संयुक्त तत्वावधान में ‘मौन की गूंज’ पर राष्ट्रीय स्तर की पुस्तक-चर्चा एवं विचार-गोष्ठी 'आत्मबोध से विश्वबोध' संपन्न

हिंदी विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, पंजाब के संयुक्त तत्वावधान में ‘मौन की गूंज’ पर राष्ट्रीय स्तर की पुस्तक-चर्चा एवं विचार-गोष्ठी 'आत्मबोध से विश्वबोध' संपन्न

अमृतसर, 8 अगस्त 2026। गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद्, पंजाब के संयुक्त तत्वावधान में वरिष्ठ कथाकार डॉ. वीणा विज 'उदित' के चर्चित कहानी-संग्रह 'मौन की गूंज' पर पुस्तक-चर्चा तथा 'आत्मबोध से विश्वबोध' विषय पर विचार-गोष्ठी का गरिमामय आयोजन विश्वविद्यालय के गुरु ग्रंथ साहिब भवन स्थित कॉन्फ़्रेंस हॉल में संपन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने की। कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों एवं साहित्य-प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की।

कार्यक्रम के प्रारंभ में सर्वप्रथम विश्वविद्यालय के शब्द गायन और परिषद गीत का गायन हुआ। इसके बाद अतिथियों का स्वागत करते हुए पुस्तक की विषयवस्तु एवं आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत की गई। इसके उपरांत विद्वानों ने कहानी-संग्रह के विविध आयामों पर अपने शोध-पत्र एवं विचार प्रस्तुत किए। परिषद की तरफ से प्रो. सुनील कुमार के दोबारा हिंदी विभागाध्यक्ष का पद्भार ग्रहण करने पर सम्मान किया गया।

कवि श्री रमन शर्मा ने अपने शोधपत्र में कहा कि 'मौन की गूंज' की कहानियाँ समाज में व्याप्त विसंगतियों, टूटते मानवीय संबंधों तथा मौन में छिपी संवेदनाओं का अत्यंत सशक्त चित्रण करती हैं। उन्होंने कहा कि लेखिका ने सामाजिक यथार्थ को केवल अभिव्यक्त ही नहीं किया, बल्कि पाठकों को आत्ममंथन के लिए भी प्रेरित किया है।

डॉ. शैली जग्गी ने अपने शोधपत्र में कहा कि इस कहानी-संग्रह में स्त्री-विमर्श, पारिवारिक मूल्यों तथा मानवीय संवेदनाओं का अत्यंत संतुलित एवं प्रभावी चित्रण हुआ है। उन्होंने कहा कि लेखिका की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संप्रेषणीय है, जो पाठकों के मन को सीधे स्पर्श करती है।

शोधार्थी मो. बिलाल ने कहा कि 'मौन की गूंज' की कहानियाँ व्यक्ति को अपने अंतर्मन से संवाद करने के लिए प्रेरित करती हैं। उन्होंने इसे समकालीन हिंदी कहानी की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि इसमें वर्तमान समाज की जटिलताओं और मानवीय संघर्षों का अत्यंत यथार्थपरक चित्रण हुआ है।

डॉ. संजय चौहान ने अपने शोधपत्र में कहा कि इस संग्रह का कथा-संसार भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, मानवीय करुणा तथा सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना से अनुप्राणित है। उन्होंने कहा कि इन कहानियों में संघर्ष के बीच आशा, संवेदना और सकारात्मक जीवन-दृष्टि की सतत उपस्थिति दिखाई देती है।

शोध-छात्रा शशि कुमारी ने अपने शोधपत्र में कहा कि 'मौन की गूंज' समाज के हाशिए पर खड़े व्यक्तियों की पीड़ा, संघर्ष और मौन प्रतिरोध को स्वर प्रदान करती है। उन्होंने कहा कि यह कहानी-संग्रह केवल समस्याओं का चित्रण नहीं करता, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से समाधान की दिशा भी सुझाता है।

अपने वक्तव्य में डॉ. सीमा जैन ने कहा कि साहित्य मनुष्य को भीतर से परिष्कृत करता है। 'मौन की गूंज' की कहानियाँ पाठकों में संवेदनशीलता, आत्मविश्लेषण और सामाजिक उत्तरदायित्व का भाव विकसित करती हैं, जो किसी भी स्वस्थ समाज की आधारशिला है।

डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि यह कहानी-संग्रह समकालीन हिंदी कथा-साहित्य की एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। उन्होंने कहा कि लेखिका ने सामान्य जीवन के छोटे-छोटे अनुभवों को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान करते हुए उन्हें सार्वकालिक अर्थवत्ता प्रदान की है।

प्रो. अमर सिंह ने कहा कि भारतीय साहित्य की मूल चेतना करुणा, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों पर आधारित है। 'मौन की गूंज' इसी परंपरा को समृद्ध करती है तथा पाठकों को समाज के प्रति अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देती है।

इस अवसर पर लेखिका डॉ. वीणा विज 'उदित' ने अपने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि उनकी प्रत्येक कहानी जीवन के वास्तविक अनुभवों, सामाजिक सरोकारों और मानवीय संवेदनाओं से जन्मी है। उन्होंने कहा कि साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन को जागृत कर उसे बेहतर इंसान बनाना है। उन्होंने सभी वक्ताओं के विचारों का स्वागत करते हुए कहा कि किसी भी रचना का वास्तविक मूल्य तब बढ़ता है, जब वह पाठकों और समीक्षकों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करती है।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुनील कुमार, विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग ने 'मौन की गूंज' के आलोक में 'आत्मबोध से विश्वबोध' विषय पर अत्यंत प्रेरणादायी विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आत्मबोध मनुष्य के व्यक्तित्व का आधार है और यही आत्मबोध आगे चलकर विश्वबोध में रूपांतरित होता है। जब व्यक्ति अपने भीतर की चेतना, संवेदनाओं और मानवीय मूल्यों को पहचान लेता है, तभी वह समाज और विश्व की पीड़ा को भी सही अर्थों में समझ सकता है।

उन्होंने कहा कि 'मौन की गूंज' की कहानियाँ केवल कथा नहीं, बल्कि आत्मसंवाद की प्रक्रिया हैं, जो व्यक्ति को स्वयं से जोड़ते हुए समूची मानवता से जोड़ती हैं। महात्मा बुद्ध, गुरु नानक देव, महात्मा गांधी और स्वामी विवेकानंद का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इन महापुरुषों का विश्वबोध भी उनके गहन आत्मबोध का ही परिणाम था। उन्होंने कहा कि आज के यांत्रिक और उपभोक्तावादी समय में साहित्य का सबसे बड़ा दायित्व मनुष्य के भीतर करुणा, संवेदना, सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व की भावना को जागृत करना है। उन्होंने कहा कि 'आत्मबोध ही विश्वबोध का प्रथम सोपान है' और यही इस कहानी-संग्रह का केंद्रीय संदेश भी है। इस अवसर पर  प्रो. सुनील कुमार ने पंजाब प्रांत के साहित्य जगत के लिए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी की। उनकी भाषायी और साहित्यिक प्रतिबद्धता की सभी ने मुक्त कंठ से सराहना की।

कार्यक्रम का अत्यंत प्रभावशाली, गरिमामय एवं सुसंगठित मंच संचालन हिंदी विभाग के शोधार्थी मुकेश कुमार ने किया। उन्होंने अपनी प्रभावशाली वाणी, साहित्यिक उद्धरणों, विषयानुकूल टिप्पणियों तथा उत्कृष्ट समय-प्रबंधन के माध्यम से पूरे कार्यक्रम को एक सूत्र में बाँधे रखा। प्रत्येक वक्ता का सारगर्भित परिचय, विषयानुसार उनके विचारों का सुंदर संयोजन तथा श्रोताओं के साथ सहज संवाद ने कार्यक्रम को अत्यंत जीवंत और प्रभावशाली बना दिया। उपस्थित विद्वानों एवं श्रोताओं ने उनके उत्कृष्ट मंच-संचालन की मुक्तकंठ से सराहना की।

प्रो. विनोद कुमार ने कृति के भाव और शिल्प पक्ष पर खूबसूरत ढंग से चर्चा करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। कार्यक्रम के अंत में अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पंजाब की ओर से लेखिका डॉ. वीणा विज का अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न भेंटकर सम्मान किया गया। राष्ट्रगान के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।

कार्यक्रम में डॉ. अतुला भास्कर, कवि उपेन्द्र यादव सहित हिंदी विभाग के सभी अध्यापकों, शोधार्थियों एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की। गोष्ठी के दौरान श्रोताओं ने वक्ताओं के साथ सार्थक संवाद भी किया। पूरे आयोजन में साहित्य, संवेदना, सामाजिक सरोकार तथा मानवीय मूल्यों की गहन उपस्थिति अनुभव की गई। यह आयोजन न केवल 'मौन की गूंज' कहानी-संग्रह के बहुआयामी मूल्यांकन का महत्वपूर्ण अवसर सिद्ध हुआ, बल्कि 'आत्मबोध से विश्वबोध' जैसी भारतीय चिंतन-परंपरा की शाश्वत अवधारणा को समकालीन संदर्भों में पुनः स्थापित करने का भी एक सफल प्रयास रहा।