डलहौज़ी में 34वीं राम सरूप अणखी स्मृति कथा गोष्ठी का तीन दिवसीय आयोजन संपन्न
डलहौज़ी के यूथ हॉस्टल में 2 से 4 अक्टूबर तक 'कहानी पंजाब' द्वारा 34वीं राम सरूप अणखी स्मृति कथा गोष्ठी का तीन दिवसीय आयोजन किया गया। प्रो. क्रांतिपाल (भारतीय भाषा विभाग, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय) के संयोजन में आयोजित यह गोष्ठी पिछले 35 वर्षों से विभिन्न भारतीय भाषाओं के कथाकारों को एक मंच पर लाती रही है, जिसकी शुरुआत पंजाबी के मूर्धन्य कथाकार राम सरूप अणखी ने की थी। कार्यक्रम की शुरुआत गोष्ठी के संचालक, कथाकार एवं 'समकाली साहित' (पंजाबी साहित्य सभा, नई दिल्ली) के संपादक केसरा राम ने आयोजन की रूपरेखा प्रस्तुत कर की।
इस राष्ट्रीय कथा गोष्ठी की अध्यक्षता जामिया मिलिया इस्लामिया के सेवानिवृत्त विभागाध्यक्ष व प्रख्यात साहित्यकार प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने की। उद्घाटन सत्र में अणखी जी के रचनाकर्म को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि अणखी जी पंजाबी के उन विरले कथाकारों में से हैं, जिन्हें अन्य भारतीय भाषाओं में व्यापक रूप से पढ़ा और अनूदित किया गया। साहित्य अकादेमी सहित देश के कई प्रतिष्ठित संस्थानों द्वारा सम्मानित अणखी जी के उपन्यासों और कहानियों का फलक अत्यंत विस्तृत व जनसरोकारों से जुड़ा रहा है।
तीन दिनों में कुल चार विचारोत्तेजक सत्र आयोजित किए गए। दूसरे सत्र में जम्मू से आए कथाकार हरदीप सिंह दीप ने पंजाबी कहानी 'आप ने बहुत देर कर दी', कश्मीरी कथाकार डोली तिक्कू आरवल ने 'शिकारे का सन्नाटा' तथा डोगरी कथाकार राज राही ने 'पुराने घावों का दर्द' का पाठ किया। तीसरे सत्र में राजस्थानी कथाकार रामेश्वर गोदारा ने 'कटुवा, काफ़िर उर्फ़...', युवा उर्दू कथाकार अब्दुर रहमान सफ़ी ने 'रज्जो' और पंजाबी कथाकार गुरमीत कड़ियालवी ने 'पिंजरा' कहानी पढ़ी। चौथे सत्र में दिनेश कर्नाटक ने 'कुमाऊँ ट्रेवल्स' (हिंदी), कमल रांची ने 'बीमार देश उर्फ़ फेंकना, फंसाना और बुलशिट' (हिंदी), जगदीप दुबे ने 'बाबर, श्रवण, फन्दी और वह' (डोगरी) तथा बलविंदर बुलेट ने 'लहू लुहान' (पंजाबी) कहानी का प्रभावशाली पाठ किया।
पढ़ी गई सभी दस कहानियों में मानवीय संबंध, विस्थापन, प्रवास और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक यथार्थ प्रमुख विषय बनकर उभरे। प्रत्येक पाठ के उपरांत कहानी की संरचना, शिल्प और कथ्य पर गहन संवाद हुआ। खुली परिचर्चा में जामिया के हिंदी विभाग से डॉ. मुकेश मिरोठा, कथाकार अरुण कुमार असफल, डॉ. सतनाम सिंह जस्सल, हरीश शर्मा, ज़ोरदार टाईम्स के संपादक दीप जगदीप सिंह, भूपिंदर सिंह बेदी, प्रो. नीलाभ, सरबजीत स्वामी, विजेंद्र विंटा, दया सिंह और भारती दत्त सहित सभी प्रतिभागियों ने अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियां और सुझाव साझा किए।
समारोह के समापन पर अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. अब्दुल बिस्मिल्लाह ने अपने चिर-परिचित बेबाक अंदाज़ में कहानियों की निष्पक्ष समीक्षा की। उन्होंने रेखांकित किया कि इस आयोजन का मूल उद्देश्य विभिन्न भारतीय भाषाओं के रचनाकारों के बीच जीवंत संवाद और साझी संवेदना को विकसित करना है। अंत में संयोजक डॉ. क्रांतिपाल ने सभी का आभार व्यक्त किया और उपस्थित साहित्यकारों को प्रशस्ति-पत्र भेंट कर सम्मानित किया।

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