यह नहीं है गुप्तदान, बिन फोटो क्या?

पत्रकार व लेखक कमलेश भारतीय की कलम से -

यह नहीं है गुप्तदान, बिन फोटो क्या?
लेखक।

आज फिर एक बात सामने आई। क्या दान देते समय फोटो सैशन  जरूरी है या नहीं? वैसे तो कहते हैं कि एक हाथ दान करे तो दूसरे को पता न हो। रहीम खान का उदाहरण भी है। वे जब दान देते तो नज़रें नीची रखते। पूछने वालों ने सवाल किया कि ऐसा क्यों करते हो खान साहब? जवाब- 
देवन वाला कोई और है 
तासों नीचे नैन...
देने वाला कोई और है तो हम कैसे आंख ऊपर उठाएं ? सच भी है कि दान देते समय शोर मचाने की जरूरत क्यों? हरियाणा के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी जो 27 साल की नौकरी में 53 तबादलों के चलते खूब चर्चित हैं यानी अशोक खेमका। इन्होंने इस कल्चर पर सवाल उठाये हैं जो दान देकर फोटो खिंचवाते हैं। सही सवाल। ऐसे वीडियो भी आ रहे हैं जब राहत देने गये और वीडियो टीम साथ। इस पर एक युवती राहत लेने से इंकार कर देती है। बाद में छोटी बहन पूछती है कि राहत क्यों नहीं ली? बड़ी बहन कहती है कि वे राशन देने नहीं, वीडियो बनाने आए थे। इसलिए भूख के बावजूद मना कर दिया। वीडियो बनवाना, फोटो खिंचवाना सिवाय गरीब का मज़ाक उड़ाने से ज्यादा कुछ नहीं। एक अधिकारी ने भी बताया कि राहत कोष में तो सीधे पैसे ऑनलाइन भेज सकते हैं लेकिन फोटो करवाने आते हैं तो हम मना भी कैसे करें? फिल्म आई थी गुप्त। गाना था: यह है गुप्त,गुप्त। लेकिन गुप्तदान कोई नहीं करता। दान अब गुप्त कोई नहीं रखना चाहता। मंदिर में एक पंखा दान देते हैं और तीनों पंखडियों पर बाप दादा का नाम लिखवाना नहीं भूलते। यह है हमारा दान का स्टाइल। बड़े मंदिरों में एक एक संगमरमर की सीढियों पर भी पता नहीं किस किस के नाम होते हैं और कौन पढ़ता है? फिर ऐसे दान का क्या देना? अशोक खेमका ने तो पता नहीं कितने विभाग सरकार की खुशी पर क़ुर्बान कर दिए। कहूं दान कर दिए। भगवान् भला करे।