टी शशिरंजन की काव्य रचना `पिताजी रहते थे इंतज़ार में'
घर की चौखट पर टिके हुए,
मध्याह्न को थोड़ा झुके हुए,
दोपहर आते ही आंखों में
बस एक ही सवाल लिये हुए—
“कब तक आओगे तुम?”
मैं कहता— “देर रात …” और
वो “हूं…” कहकर चुप हो जाते,
उनके उस उदास “हूं” में,
छिपी रह जाती, हज़ारों अधूरी बातें ।
जैसे कहना था, उन्हें कुछ खास
तुम रहो हर वक्त मेरे साथ।
मेरी अनपुस्थति का डर उन्हें
भीतर तक बेचैन कर देता हो।
और मेरे दूर होने का ख्याल
उन्हें अंदर से तोड़ देता हो।
फिर मां से कहते धीमे स्वर में—
“ज़रा फोन कर, कह दो…
अगर संभव हो तो-
कुछ पहले ही आ जाए…।”
बेटे से दूर होने का डर,
बहू से, छिपाते हुये
मुस्कराकर कहते—
“तुम भी बोल दो उससे,
शायद तुम्हारी ही सुन ले…।”
सबको पता था, यह कोई
साधारण बात नहीं थी,
ये बस एक आदत भी नहीं,
मेरे प्रति उनका सच्चा प्यार था—
जो नज़र से महसूस होता था,
लेकिन शब्दों में कभी,
पूरा समा नहीं पाता था।
प्रसाल में यूं ही टहलते रहते,
कभी-कभी बेचैन हो जाते थे,
दरवाज़े की आहट सुनते ही
एकदम से ठहर से जाते थे।
और जैसे ही मैं पहुंचता था—घर
उनकी आंखों में सुकून उतर आता,
जैसे उनका पूरा दिन थककर
बस उसी पल में सो जाता।
उन्होंने तुम याद आते हो,
कभी नहीं कहा,
“तुम्हारे बिना मन नहीं लगता”
कभी नहीं कहा,
बस इतना ही कहते हर रोज़—
“अगर संभव हो… तो तुम,
थोड़ा पहले ही आ जाना…।”
आज वो नहीं हैं, लेकिन
हर दोपहर, उनकी
अनुपस्थिति की खामोशी में,
उनका वह प्रश्न सुनाई देता है।
घर की खामोश दीवारों के
सन्नाटे में अब भी एक
आवाज़ गूंजती है—
“कब आओगे तुम?”
और मैं… बस चुप रह जाता हूं,
नहीं कह पाता - कि रात में ।
कुछ भी कह नहीं पाता।
क्योंकि अब
मेरे पास कोई जवाब नहीं,
सिर्फ खामोशियां हैं—
जो हर सवाल से भी ज़्यादा बोलती हैं।
टी शशिरंजन

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