ख्वाबों से यादों तक

ख्वाबों से यादों तक

कभी सोचा भी नहीं था
कि बचपन की आंखों में 
पलते वो नन्हे-नन्हे ख्वाब,
एक दिन जिंदगी की चौसर,  
पर यादों के मोती बनकर 
बिखर जायेंगे-

वो कागज की नावें,
बारिश की पहली बूंदों 
संग बहते हमारे अरमान,
गली के मोड़ पर ठहरती 
शामें, और बेफिक्र हंसी के 
अनगिनत निशान---

तब कहां मालूम था कि,
समय अपनी हथेली 
पर सब कुछ लिख जाता है,
और जो आज जी रहे हैं हम,
कल वही किसी कहानी का 
हिस्सा बन जाता है।

तीन दशक बाद जब
यादों की पुरानी संदूक 
खुलती है, तो कुछ लम्हे 
होठों पर मुस्कान रख जाते हैं,
और कुछ चुपके से 
मेरी आंखों को 
नम कर जाते हैं।

वो दोस्त जिसके बिना
एक पल भी अधूरा लगता था,
आज दिलों में मुस्कुराते हैं, और
दिल उसे छूने को तरसता है।

वो सपने, जो कभी बेहद  
आसान से लगते थे,
कभी पूरे नहीं हुए और, 
राहों में तिनकों की तरह
उड़ गये । 

मगर उनकी खुशबू 
आज भी दिल के 
किसी कोने में महकती है।

अजीब है न यह सफर—
जो पल कभी बस ऐसे ही
 गुजर रहे थे, आज वही 
सबसे कीमती लगते हैं;
जिन्हें जीते वक्त हमने 
संभाला नहीं, उन्हें याद 
करके अब दिल भर आता है।

फिर भी शुक्र है उन 
लम्हों का, जो हमारी 
रूह में बसे हुए हैं,
क्योंकि यादें कभी जाती 
नहीं हैं, वह हर बार आती
है लौटकर और हमें हमारे ही 
पुराने रूप से मिला जाती हैं।

और तब लगता है—
जिंदगी सिर्फ आगे बढ़ने
का नाम नहीं, कभी-कभी 
पीछे मुड़कर देखना भी जरूरी है,
ताकि समझ सकें कि
बचपन के वे मासूम ख्वाब 
सचमुच कहीं खोए नहीं हैं...

वे आज भी हमारे भीतर
याद बनकर धड़क रहे हैं।

टी शशिरंजन