टी शशिरंजन की काव्य रचना-  तुम्हारा ‘बाद में’ कहना  

टी शशिरंजन की काव्य रचना-  तुम्हारा ‘बाद में’ कहना  

दोस्तों के साथ बाहर जाने के बाद,
और उस दौरान मुझे तुमको फोन 
नहीं करने के तुम्हारे मनुहार के बीच,
मेरी लाड़ भरी नाराज़गी पर
तुमने बस धीरे से कहा—
“परेशान कर दिया ना मैंने तुम्हें…
लेकिन तुम अपना काम कर लो,
मैं भी कर लेती हूं अपना काम…
जैसे ही वक्त मिलेगा, कॉल करूँगी…”

और मैं वहीं ठहर गया—
तुम्हारी इस सादगी में,
जिसमें अजीब-सी मिठास घुली हुई थी,
जो बिना शोर किए दिल तक उतर गई।
तुम्हारा यूं थोड़ा-सा दूर हो जाना भी
मुझे भीतर तक बेचैन कर देता है,
और तुम्हारे न होने का एहसास
जगा देता है, मन के भीतर के दावानल को।

तुमसे बात करना
तुम्हारे होने के एहसास को जिंदा रखता है,
और वही एहसास
मुझे हर बार तुम्हारे और करीब आने का
एक नया बहाना दे देता है।

मैं भी तुम्हें कहना चाहता हूं—
“परेशान तो तुम करती हो…
पर सच यही है कि ये परेशानी,
मेरे लिए सुकून बन जाती है।
तुम्हारे बिना सब कुछ अधूरा लगता है…
जल्दी आ जाओ,
वरना ये दिल तुम्हें
बेहिसाब याद करने लगेगा…”

और अगर तुम देर करोगी,
तो इन छोटी-छोटी बातों के बीच
एक गहरी खामोशी फैल जाएगी—
जिसमें तुम्हारी आवाज़ की खनक थी, 
और मेरे इंतज़ार की धड़कन भी।

तुम्हारा “मैं कॉल करूँगी”
मेरे लिए सिर्फ एक वाक्य नहीं,
एक उम्मीद है—
जो हर पल मेरी सांसों के साथ चलती रहती है।
और मेरा “मैं इंतज़ार करूंगा” कहना
सिर्फ एक शब्द नहीं,
एक अधूरी-सी धड़कन है—
जो सिर्फ तुम्हारे नाम से ही पूरी होती है।

तुम्हारा यूं मुझे परेशान करना, 
मेरे दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा है,
क्योंकि इसमें छुपा होता है
तुम्हारा ख्याल, तुम्हारा अपनापन,
और तुम्हारी खामोश मोहब्बत
जो सिर्फ मेरे लिए होती है।

तो तुम यूं ही कहती रहना—
“मैं बाद में कॉल करूँगी…”
और मैं हर बार उस “बाद में” को जीता रहूंगा—
जैसे कोई दुआ,
जैसे कोई इबादत,
जो तुम्हारी एक आवाज़ से
हर बार मुकम्मल हो जाती है।
टी शशिरंजन