टी शशिरंजन की काव्य रचना `पिता जैसा'
मेरे पिताजी जैसा
एक आदमी दिखा —
थोड़े सफ़ेद,
थोड़े काले
और विरल
घुंघराले बालों-
के साथ ।
उसी तरह
मुस्काराते हुये
और आंखों में
तेज चमक लिये।
सांसों में
पान और कत्थे
की वही गंध,
जैसे आसमान से
उतर आयी हो
उनकी ही कोई स्मृति
केवल मेरे लिये।
दूर से ही
पहचान में
आ गये बुजुर्ग,
पिताजी की तरह —
थोड़े झुके हुए,
थोड़े चुप,
लेकिन, उनसे इतर
भीतर से टूटे हुए
बहुत-से।
उनकी आंखों में
वही बेचैनी थी,
जो कभी
पिताजी की
आखों में
देखी थी मैंने,
जैसे बहुत कुछ
कहकर भी
कुछ भी नहीं
कह पाने की
थकान झलक
रही हो
उनके चेहरे
पर भी, पूरी तरह।
लेकिन -
वह पिताजी
नहीं थे,
क्योंकि वह तो
अब तस्वीर में ही
पूरे बचे हैं—
जैसे समय ने
मिटा दिया हो
उन्हें धीरे-धीरे
और-
स्मृतियों ने
बस उनका
आकार भर
छोड़ा है।
फिर भी,
जब-जब
कोई ऐसा
व्यक्ति दिखता है,
दिल एक पल को
ठहर जाता है—
और लगता है,
पिताजी
लौट आए हैं
किसी और चेहरे में,
अपनी अधूरी
कहानी लेकर।
टी शशिरंजन

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