टी शशिरंजन की कविता `पिता के जाने के बाद'

टी शशिरंजन की कविता `पिता के जाने के बाद'
लेखक।

शिशिर की वह सर्द दोपहर,
चारों ओर पसरा थी, मौन  
मन था मेरा उदास, और लगा था 
जैसे थम गया हो हर एक रास्ता।

सबके बीच शांत बैठे थे आप,
चेहरा कुछ निस्तेज-सा था,
और हर दिन की तुलना में उस दिन,
आपका शब्द भी कम हो गया था।

मानो समय वहीं थम सा गया था,
आप बैठे-बैठे, बातें करते रहे,
और फिर एक पल में यूं ही चुपचाप,
हाथों से ज़िंदगी फिसलती चली गई।

हम बस आपको देखते रह गए,
आंखों में ठहरा था एक ही सवाल—
अभी तो यहीं थे, फिर ये क्या हुआ,
क्यों छूट गया, यूं अचानक आपका साथ।

हम रह गए  थे उसी पल में अटके,
नजंरों में इंतजार, दिल में लिये पुकार,
कि शायद अभी आप कुछ कह देंगे…
और लौट आएगा वो बीता संसार।

तीन महीने हो गए आपको गए,
पर ये दूरी बस समय की लगती है,
इन बीते हर एक दिन में भी,
आपकी मौजूदगी ही महसूस होती है।

कभी ऐसा नहीं लगा एक पल भी,
कि आप मुझसे दूर हुए हैं,
हर सांस, हर एहसास में आप,
और भी करीब से जुड़े हुए हैं।

अब भी दरवाजे पर ही नजरें रहती हैं,
जैसे आप मंदिर से लौटेंगे,और 
पुकार कर कहेंगे, दरवाजा खोलो,
हर हल्की सी आहट में ऐसा ही लगता है,

आपकी हंसी अब भी गूंजती है,
इन खामोश हो चुके दीवारों के बीच,
आपके सिखाए हर एक लफ्ज में,
आप हैं मेरे बिल्कुल करीब।

जब-जब मैं थककर रुक जाता हूं,
आपकी बातें सहारा बनती हैं,
“मत हारना और बातों को घोंट जाना”
आपकी आवाज राह दिखाती है।

पिता, आपका स्नेह उस छांव सा है,
जो अब भी मुझ पर ठहरा हुआ है,
आप नहीं हैं सामने ये सच है,
पर आपका एहसास गहरा हुआ है।

आपके अनुराग की वो गर्मी,
दिल को सुकून देती है,
आपकी यादों की उजली किरण,
हर अंधेरे में रोशनी भरती है।

आप कहीं गए नहीं हैं पूरी तरह,
बस नजरों से ओझल हो गए हैं,
आप तो मेरे हर धड़कन में हैं,
बस थोड़े से दूर हो गए हैं।

टी शशिरंजन