मसनूई मुस्कान

मसनूई मुस्कान

मसनूई मुस्कानें बड़ी अद्भुत होती हैं,
दर्द की चादर पर चुपचाप सोती हैं।
दुनिया समझती है सब कुशल-मंगल है,
भीतर कोई टूट रहा हो, किसे इसका संबल है?

कभी सम्मान बचाने को मुस्कुराना पड़ता है,
कभी रिश्तों को निभाने को मुस्कुराना पड़ता है।
कभी आँसुओं को आँखों में कैद करके,
भीड़ के बीच खिलखिलाना पड़ता है।

 कितना विचित्र खेल है,जो बहुत हँसता है,
अक्सर वही सबसे अधिक दर्द छुपाता है।
जो सबको साहस बाँटता फिरता है,
कभी-कभी स्वयं ही सहारे को तरस जाता है।

मगर हर मुस्कान मसनूई नहीं होती,
हर हँसी मजबूरी नहीं होती।
कुछ लोग दर्द को भी दीपक बना लेते हैं,
और अँधेरों में भी उजाला सजा लेते हैं।

मसनूई मुस्कान यदि किसी का मन बचा ले,
किसी टूटे हुए हृदय को संभाल ले,
तो वह छल नहीं, तपस्या बन जाती है,
और पीड़ा भी प्रार्थना बन जाती है।

फिर भी ऐ मन,
इतना अभिनय मत करना
कि अपना ही चेहरा भूल जाए।
इतनी भी मसनूई मुस्कान मत ओढ़ना
कि तेरी आत्मा तुझसे दूर हो जाए।

(ललित बेरी)