कौन चाहेगा / अश्वनी जेतली प्रेम 

कौन चाहेगा / अश्वनी जेतली प्रेम 
कवि।

अंदर से टूटा हुआ मनुष्य                     
अक्सर बाहर से मज़बूत दिखने के लिये 
लेता है दंभ का सहारा      
दिल की शिकन
चेहरे पर नहीं होने देता प्रकट                          
होठों पर चिपका लेता है 
मस्नूई मुस्कान  
महज़ कुछ बंधनों, कुछ रिश्तों की खातिर
                               
रिश्ते बनाता है, रिश्ते निभाता है, 
और अक्सर ढोता रहता है 
ताउम्र रिश्तों का बोझ 
                             
बना रहता है तब तक तो नायक 
उनके लिए वो 
टूटा हुआ, बिखरा हुआ, 
बुझा बुझा ही उसे
देखना चाहते हैं जो
अपने निहित मंत्वों को सम्पूर्णता तक लाने के लिए
           
लेकिन                      
जब वो टूटा हुआ इंसान
बोझ बन रहे रिश्तों को 
कंधों से उतार फेंकने का 
कर लेता है साहस                     
तो बन जाता है खलनायक ...       

अंदर से टूटे हुए मनुष्य को  
कभी भी  
और तोड़ने का नहीं करना चाहिए प्रयास 
क्यूंकि जब कर लेता है वो
स्वयं को समेटने का साहस 
तो बन जाता है संग से भी कठोर 
फिर चाहे कोई उसे संगदिल कहे 
या खलनायक 
पर वो तो हो जाता है स्वयं अपनी कथा का नायक

अंदर से टूटा हुआ मनुष्य 
वास्तव में तब तक ही
खुद को रिश्तों के हाथों टूटते हुए देखना
सहता रहता है
जब तक कि इति नहीं हो जाती

भला कौन चाहेगा     
टूटते टूटते टूट जाना
मरने से पहले मर जाना