सारथी /अश्विनी जेतली 'प्रेम'
लक्ष्मण रेखा है यह कैसी
मर्यादा की
जिसको लांघ न पाता हूं
कैसा चक्रव्यूह है यह समाज
किसी अंधेर नगरी-सा
जिसमें धंसता जाता हूं
कैसा है यह भवसागर जीवन
अपने ढंग से जी भी ना पाता हूं
छटपटाता हूं
मायूस सा हो जाता हूं
...और फिर
अगले ही क्षण
हिम्मत जुटाता हूं
यादों और कल्पनाओं के
रथ पर हो सवार
द्वंद के कुरुक्षेत्र में
स्वयं अपना सारथी बन जाता हूं

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