गुरु शिष्य परंपरा का फिर से विकास आवश्यकः डॉ दीप्ति हुड्डा

गौड़ बीएड कॉलेज में राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित।

गुरु शिष्य परंपरा का फिर से विकास आवश्यकः डॉ दीप्ति हुड्डा

रोहतक, गिरीश सैनी। गौड़ ब्राह्मण शिक्षण महाविद्यालय में आयोजित आईसीएसएसआर प्रायोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के दूसरे दिन बतौर मुख्य वक्ता एमडीयू के मनोविज्ञान विभाग की प्रोफेसर डॉ दीप्ति हुड्डा, लाइब्रेरी एसोसिएशन नई दिल्ली के अध्यक्ष डॉ प्रदीप राय, एवं मैत्री कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ श्रुति कांत पांडे ने शिरकत की। प्राचार्या प्रो. महाश्वेता ने अतिथियों का तुलसी के पौधे भेंट कर स्वागत किया। वक्ताओं ने -भारतीय ज्ञान परंपरा का शिक्षक शिक्षा में समावेशः 21वीं शताब्दी में शिक्षा एवं शिक्षक की बदलती परिभाषा- विषय पर अपने विचार रखे।

डॉ दीप्ति हुड्डा ने कहा कि आज के अध्यापक को गुरु के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। इसमें भारतीय ज्ञान परंपरा के संस्कारों का एक महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उन्होंने शिक्षक शिक्षा के क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक शोध पर बल दिया। डॉ प्रदीप राय ने कहा कि मैकाले शिक्षा नीति से पूर्व हमारे देश की अपनी गुरुकुल परम्पराएं थी, जिन्हें हमने धीरे-धीरे पीछे छोड़ दिया। डॉ श्रुतिकांत पांडे ने संस्कृत भाषा को भारतीय ज्ञान परंपरा का उदघोषित आधार बताया। 64 कलाओं का जिक्र करते हुए उन्होंने भारतीय पारंपरिक ज्ञान के महत्व को उजागर किया।

इसके अलावा डॉ सुनीता आर्य, प्रो. तरूणा मल्होत्रा, डॉ सतीश शर्मा, डॉ विकास ढलवाल ने भी अपने विचार साझा किए। इस दौरान बीएड एवं आयुर्वेद के विद्यार्थियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित एक प्रदर्शनी भी लगाई, जिसमें प्राचीन भारतीय पद्धतियों को प्रदर्शित किया गया। विभिन्न महाविद्यालयों से आए प्राध्यापकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने अपने शोध पत्र एवं लेख ऑफलाइन एवं ऑनलाइन माध्यम से प्रस्तुत किए। कार्यक्रम संचालन डॉ गीता रानी व डॉ विनोद कुमार ने किया। डॉ सविता शर्मा ने आभार व्यक्त किया। इस दौरान डॉ रेणु नांदल, डॉ मोना मल्होत्रा, डॉ सोन किरण, डॉ रानी, पूनम अत्री, डॉ अनिल कुमार, डॉ गीता पाठक, डॉ तिलक गौड़ सहित प्रतिभागी मौजूद रहे।