टी शशिरंजन की काव्य रचना/पापा की तबीयत
पापा की तबीयत
घर की उस शांत और सुस्त दोपहरी में
मैं यूँ ही चुपचाप बैठी थी…
खिड़की के बाहर चिड़ियों को,
और गिलहरी को धीरे-धीरे
पानी पीते देख रही थी।
प्रकृति जैसे अपने ही सुर में मग्न थी,
और मैं…खिड़की से बाहर देख कर
बचपन के बाल सखा को याद कर
हल्के से मुस्कुरा उठी थी।
लगा जैसे वक़्त ने अचानक
अपनी रफ्तार थाम ली हो कहीं…
हर चीज़ ठहर सी गई,
हर सांस धीमी पड़ गई,
अचानक मन हो गया उदास
जैसे पल भी आगे बढ़ने से रुक गया।
सब कुछ ठहरा हुआ सा,
उसी ठहराव को चीरती —
फोन की घंटी बजी…
जिसने सन्नाटे को टुकड़ों
में तोड़ दिया।
उधर से एक काँपती हुई आवाज़ आयी—
“तुम्हारे पापा… पापा ठीक नहीं…”
बस इतना सुनना था कि जैसे,
दिल अपनी जगह से खिसक कर
कहीं खालीपन में गिर गया …
और धड़कनें,
धड़कनें बिखरकर जैसे राहों में छूट गईं,
साँसें उलझ गईं, शब्द गुम हो गए—
और खयाल, खयाल कहीं मन से विदा हो गया,
कदमों ने मानो ठहरना ही भूल गया।
मैं दौड़ी…बेखबर, बेसुध,
न कुछ सोचा, न कुछ समझा—
बस एक डर था, जो मुझे भीतर से
खोखला करते जा रहा था…
मैं दौड़ती रही—
सिर्फ पापा तक पहुँच जाने की
एक आख़िरी उम्मीद लिए।
जब पहुंची....तो वो सामने थे…
पर जाने क्यों, बहुत दूर लग रहे थे।
आंखों में वही अपनापन, वही स्नेह,
पर चेहरे पर दर्द की परछाइयां थीं—
जैसे कोई चुपचाप विदा ले रहा हो।
लोग उन्हें एम्बुलेंस तक
ले जा रहे थे, भाई साथ में दौड़ रहा था
मां खड़ी चुपचाप, व्यथा के साथ
खड़ी वहां से जाते उनको देख रही थी,
समय मेरी मुट्ठी से रेत की तरह
फिसल रहा था, तेज दौड़ लगा
रहा था, मैने की थी रोकने की कोशिश,
लेकिन कौन आज तक वक्त को पकड़
सका है ।
उसी भागते पल में…
उन्होंने पकड़ा था मेरा हाथ,
वो स्पर्श…आज भी मेरी रूह में
धड़कता है।
मैंने छुड़ाने की कोशिश की,
मजबूरी थी… था, वक्त का दबाव,
पर उनकी पकड़ ऐसी थी,
कि ढीली पड़ने का नाम लेती थी—
जैसे उस स्पर्श में ही रुक जाना
चाहती थी, हर जाती हुई सांस,
जैसे वह आखिरी आस
मुझे थामे रखना चाहती हो…
हमेशा के लिए।
जैसे हर उंगली में एक कहानी
बसी हो, हर स्पर्श में
एक अनकही दुआ,
हर थामना…एक आखिरी भरोसा।
और जब आखिरकार
वो हाथ छूटा…
तो लगा जैसे मेरी पूरी दुनिया
एक पल में ठहर गई हो।
आज भी वो लम्हा
मेरी आँखों में आकर ठहर जाता है,
आँसू बनकर बहता है—
और हर बार,
मुझे फिर से जीना सिखा जाता है।
कभी-कभी सोचती हूँ…
क्या वो बस एक पल था?
या पूरी ज़िंदगी का सार…
क्योंकि उस एक पकड़ में ही
समा गई थी मेरी हर खुशी,
हर प्रार्थना, हर मोहब्बत…
और उनकी उस पकड़ में
एक थी, अजीब-सी ताकत—
जैसे कहना चाहते हों,
“डरना मत… मैं यहीं हूँ…
सदा तुम्हारे पास।”
-टी शशिरंजन

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