टी शशिरंजन की एक काव्य रचना/ `पिता अचानक गये'
पिता अचानक गये
मैं पिता के साथ बैठा था,
घाम तापते शह-नशीन में,
उनके साथ बातें हो रही थी,
बातों में जैसे जीवन बह रहा था,
हालांकि, उनका चेहरा उस दिन
मुझे कुछ मुर्झाया लगा, और
वह पुराना तेज कहीं खो गया था।
अख़बार हाथ में था उनके,
पर आंखें कहीं और टिकी थीं,
मुझसे बातें करते रहे थे और
उनके हर एक अल्फाज में जैसे,
जिंदगी का पैगाम था।
उस दिन उनके लफ्जियात
निकल रहे थे,लेकिन
मौन था जहन का दरीचा ।
पौष की ठंडी दोपहर में भी
अचानक उन्होंने कहा— कुछ गर्मी है।
सदरी और जाकट उतार दी।
मैने भी कहा था, हां मौसम में गर्मी है।
उस दिन सूरज की तपिश कुछ तल्ख थी,
उठे… चुपचाप कमरे में आये,
पहले लेटे, फिर सहसा उठ बैठे।
मैंने पूछा—“तबीयत कैसी है आपकी?”
उन्होंने पीठ घुमाई मेरी ओर,
सिर को हल्के से ‘नहीं’ में हिलाया,
और बहुत धीमे स्वर में कहा—“कुछ नहीं…”
उस “कुछ नहीं” में कितना कुछ था,
मैं समझ ही न पाया उस क्षण,
वहीं कहीं समय की आख़िरी आह
जैसे धीरे-धीरे थम रहा था जीवन।
फिर अचानक… रुक गया सब,
सांसें भी जैसे ठहर-सी गईं,
बिना किसी शोर और, बिना किसी आहट
जिंदगी की डोरी चुपके से छूट गयी।
जीवन हो गया मौन, निशब्द....
और ‘पंकज’ अवाक.....
मां पास ही बैठी रह गयीं,
पत्नी की आंखें प्रश्न बन गयी,
बच्चे देखते रहे अनजाने भय में,
और फिर मेरे ही साथ-साथ
सबने आवाज लगायी, लेकिन
उन्होंने नहीं सुने थे, हमारे नाद,
और सबकी दुनिया बदल गयी।
फिर अजीब-सी घबराहट छाई,
हाथों में हाथ थामे बैठा मैं सिरमे में,
पत्नी गंगाजल और तुलसी पत्र लिये
उनको पुकार रही थी खौफजदा से।
"पापा… पापा…" आवाजें गूंज उठीं,
मां की सिसकियां छूट रही थी,
पत्नी की आंखों में भय था,
गहरे क्रंदन के बीच उम्मीद से
उसने माथा सहलाया उनका,
मैने टटोलनी चाही नब्ज,
लेकिन समय जैसे ठहर गया था,
जीवन धीरे-धीरे फिसल रहा था,
हम सबकी बेचैनी के बीच
उनका जीवन दूर हमसे
कहीं निकल रहा था।
मैं वहीं था, बैठा सबके बीच,
पर भीतर जैसे बिखर गया था,
एक आवाज चिल्ला रही थी अंदर—
"रुक जाइये…" पर सब थम गया।
एक पिता, एक दोस्त, एक अपना,
एक सच्चा साथी, एक राजदार,
एक साथ मुझसे जुदा हो गया,
भीड़ भरे घर के भीतर भी, मैं
एकदम तन्हा बैठा था।
अब घर में सब कुछ है वैसे ही,
पर वह आवाज़ कहीं नहीं है,
सबके बीच खड़ा हूं फिर भी,
सच तो यह है कि कोई नहीं है।
उनकी हंसी, उनकी सीखें,
हर कोने में गूंज रही हैं,
पर हाथ बढ़ाऊं जब भी मैं,
बस उनकी यादें ही छूती हैं।
उस दिन समझ आया मुझको—
जाना होता है आसान कितना,
पर जो रह जाते हैं, पीछे
उनका जीना कठिन होता है कितना।
उस आखिरी क्षण की मेरी अकुलाहट
अब भी दिल में बस जाती है,
हम पकड़ना चाहते हैं समय को,
पर,
वह मुट्ठी से रेत-सा फिसल जाता है।
टी शशिरंजन

City Air News 

