गुरु नानक देव विश्वविद्यालय में ‘हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श’ पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न
गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग एवं कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA 2.0) के सहयोग से ‘हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया।
अमृतसर, 15 फरवरी, 2026: गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग एवं कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA 2.0) के सहयोग से ‘हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श’ विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का सफल आयोजन किया गया।

स्वागत-उद्बोधन एवं संगोष्ठी-परिचय प्रो. सुनील शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी विभाग एवं डीन, भाषा-संकाय द्वारा प्रस्तुत किया गया। उन्होंने अपने स्वागत भाषण में कहा कि विश्वविद्यालय के उप-कुलपति प्रो. करमजीत सिंह के कुशल नेतृत्व और प्रेरणा से हिंदी विभाग द्वारा निरंतर साहित्यिक गतिविधियों का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने संगोष्ठी में सहयोग के लिए RUSA 2.0 के समन्वयक प्रो. हरमिंदर सिंह और कृषि अनुसंधान एवं नवाचार केंद्र के समन्वयक प्रो. प्रताप कुमार सहित विश्वविद्यालय प्रशासन का विशेष तोर पर आभार व्यक्त किया। अपने वक्तव्य में उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में किसान केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा है। प्राचीन साहित्य से लेकर समकालीन लेखन तक किसान जीवन की व्यथा, संघर्ष, श्रम और संवेदना का सशक्त चित्रण मिलता है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर बल दिया कि आज जब कृषि संकट, भूमि-अधिग्रहण, ऋणग्रस्तता और आत्महत्या जैसे प्रश्न समाज के सामने गंभीर चुनौती के रूप में उपस्थित हैं, तब साहित्य की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
उद्घाटन वक्तव्य प्रो. के.के. शर्मा, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, जामिया मिलिया इस्लामिया, नई दिल्ली द्वारा दिया गया। उन्होंने कहा कि इस संगोष्ठी की एक प्रमुख सार्थकता यह भी है कि यह साहित्य को केवल भावात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित न रखकर सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम बनाती है। किसान-विमर्श के माध्यम से ग्रामीण जीवन की संवेदनाओं, श्रम-संस्कृति और मानवीय मूल्यों को नई दृष्टि मिलती है।
उद्घाटन सत्र के अध्यक्ष पद्मश्री प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी, कुलपति, हिमाचल प्रदेश केंद्रीय विश्वविद्यालय, धर्मशाला ने कहा कि किसान-विमर्श हिंदी साहित्य की सामाजिक प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने कहा कि भारत मूलतः कृषि-प्रधान देश रहा है, जहाँ किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना के वाहक भी हैं। हिंदी साहित्य में किसान जीवन का चित्रण प्रेमचंद से लेकर समकालीन रचनाकारों तक निरंतर होता रहा है, किंतु बदलते सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में किसान की समस्याएँ और जटिल हुई हैं। मुख्य अतिथि प्रो. सतनाम सिंह दयोल, डीन, छात्र कल्याण, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श पर राष्ट्रीय संगोष्ठी न केवल अकादमिक विमर्श को समृद्ध करती है, बल्कि समाज के वास्तविक सरोकारों को साहित्य के केंद्र में स्थापित कर समकालीन चिंतन को दिशा प्रदान करती है। विशेष अतिथि के रूप में प्रो. गुरमीत सिंह, हिंदी विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ उपस्थित रहे। उन्होंने कहा कि प्रेमचंद के उपन्यास गोदान में होरी के माध्यम से किसान की दारुण स्थिति, सामंती शोषण और आर्थिक विवशता का मार्मिक चित्रण मिलता है। मुंशी प्रेमचंद ने किसान को केवल करुणा का पात्र नहीं, बल्कि नैतिक संघर्ष का प्रतीक बनाया। आगे चलकर फणीश्वरनाथ रेणु के मैला आँचल में ग्रामीण जीवन की जीवंतता, लोक-संस्कृति और राजनीतिक बदलावों के बीच किसान की स्थिति का यथार्थपरक चित्र सामने आता है। इस सत्र में पद्मश्री प्रो. हरमहेंद्र सिंह बेदी, डॉ. निर्मल कौशिक, शांति कुमार स्याल और रमन कुमार शर्मा की पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। सत्र का संचालन लवली, शोध-छात्रा ने किया तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रिया, पी.जी.डी.टी., समस्तर-दो द्वारा किया गया।
मध्याह्न काल में आयोजित प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. भवानी सिंह, हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला ने की। उन्होंने कहा कि ऐसी संगोष्ठी साहित्य और समाज के बीच सेतु का कार्य करती है। यह मंच विद्वानों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों को एक साथ विचार-विमर्श का अवसर प्रदान करता है, जिससे किसान-जीवन के यथार्थ, उसकी संघर्षगाथा, विस्थापन, ऋणग्रस्तता, आत्मसम्मान और बदलती कृषि नीतियों जैसे मुद्दों पर गंभीर चिंतन संभव हो पाता है। इस सत्र में प्रमुख उपस्थिति डॉ. सिद्धार्थ शंकर राय, हिंदी विभाग, हरियाणा केंद्रीय विश्वविद्यालय, महेंद्रगढ़ की रही। उन्होंने कहा कि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल और त्रिलोचन जैसे कवियों ने भी किसान के श्रम, प्रकृति से उसके संबंध और व्यवस्था के प्रति उसके आक्रोश को स्वर दिया। आधुनिक दौर में भूमंडलीकरण, हरित क्रांति, कर्ज़, आत्महत्या और बाजारवादी दबावों ने किसान-विमर्श को और जटिल बनाया है। समकालीन लेखन में किसान केवल आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि पहचान, अस्मिता और अधिकारों के संघर्ष का प्रतीक बनकर उभरता है। प्रथम सत्र की मुख्य अतिथि डॉ. रजनी प्रताप, हिंदी विभाग, पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला तथा विशेष अतिथि डॉ. अनिल कुमार, हिंदी विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक रहे। डॉ. रजनी प्रताप ने कहा कि किसान-विमर्श को केवल आर्थिक या सामाजिक दृष्टि से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक संदर्भों में भी समझने की आवश्यकता है। डॉ. अनिल कुमार ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकगीतों, लोककथाओं और ग्रामीण जीवन से जुड़े साहित्य में किसान की छवि केवल श्रमिक के रूप में नहीं, बल्कि संवेदनशील, संघर्षशील और आत्मसम्मानी व्यक्तित्व के रूप में उभरती है। इस सत्र में डॉ. कंवलजीत कौर, रोबिन, सुनयना अरोड़ा तथा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. निर्मल कौशिक ने अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए। सत्र-संचालन पूजा देवी, शोध-छात्रा ने किया तथा धन्यवाद-ज्ञापन रिया, एम.ए., समस्तर-चार द्वारा प्रस्तुत किया गया। इसी सत्र में अ.भा.सा.प., पंजाब द्वारा आयोजित कहानी प्रतियोगिता-2025 के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
भोजनावकाश के उपरांत आयोजित द्वितीय सत्र की अध्यक्षता प्रो. सुखदेव सिंह मिन्हास, पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, सेक्टर-11, चंडीगढ़ ने की। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श भारतीय समाज की जड़ों से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण चिंतन-क्षेत्र है। भारत मूलतः कृषि प्रधान देश रहा है, इसलिए किसान का जीवन, उसकी संघर्ष-गाथा, शोषण, आशाएँ और विद्रोह साहित्य का स्वाभाविक विषय बने। किसान-विमर्श केवल खेत-खलिहान का वर्णन नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संरचना की आलोचनात्मक पड़ताल भी है।
इस सत्र में प्रमुख उपस्थिति प्रो. अमनदीप सिंह, निदेशक, युवा कल्याण विभाग, गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर की रही। प्रो. अमनदीप सिंह ने कहा कि हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना और परिवर्तन की आकांक्षा से जुड़ा व्यापक विमर्श है, जो भारतीय जीवन-दर्शन को समझने की कुंजी प्रदान करता है। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. शैली जग्गी, हिंदी विभाग, बीबीके डीएवी महिला महाविद्यालय, अमृतसर तथा विशेष अतिथि डॉ. समीर महाजन, हिंदी विभाग, पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा उपस्थित रहे। डॉ. शैली जग्गी ने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि किसान-विमर्श को लैंगिक दृष्टि से भी देखने की आवश्यकता है, क्योंकि खेतों में स्त्रियों का श्रम अक्सर उपेक्षित रहता है।डिजिटल माध्यमों और नई विधाओं के माध्यम से किसान जीवन की अभिव्यक्ति के नए आयाम खुल रहे हैं। डॉ. समीर महाजन ने कहा कि यदि साहित्य में किसान की समस्याएँ, उसकी आकांक्षाएँ और संघर्ष प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त होंगे, तो नीति-निर्माताओं और समाज का ध्यान भी इन प्रश्नों की ओर आकर्षित होगा। इस सत्र में शोध पत्र-प्रस्तुति एवं संगोष्ठी रिपोर्ट प्रस्तुत की गई। इस सत्र में डॉ. दीप्ति, डॉ. मीनू नंदा, डॉ. डिंपल शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार शांति कुमार स्याल ने अपने प्रपत्र प्रस्तुत किए। सत्र का संचालन श्री मो. बिलाल, शोध-छात्र ने किया तथा धन्यवाद-ज्ञापन श्री गुरविंदर सिंह, एम.ए., समस्तर-एक द्वारा किया गया। संगोष्ठी के संयोजक प्रो. सुनील शर्मा ने विद्यार्थियों को संगोष्ठी में प्रतिभागिता के लिए प्रोत्साहित करने पर एस.एस.एम. कॉलेज, दीनानगर के प्राचार्य डॉ. आर.के. तुली और शांति देवी आर्य महिला महाविद्यालय, दीनानगर की प्राचार्या डॉ. सरला निरंकारी का आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर संस्कृत विभाग से डॉ. विशाल भारद्वाज, डॉ. सलोनी, डॉ. विकास जोशी, विदेशी भाषाएं विभाग से सुनयना, मैडम रमनदीप कौर, पंजाबी विभाग से प्रो. मनजिंदर सिंह, डॉ. मेघा सलवान, डॉ. बलजीत कौर रियाड़, हिंदी विभाग से मैडम पिंकी शर्मा, डॉ. सपना शर्मा, डॉ. लवलीन कौर, डॉ. नेहा हंस, दीपक शर्मा, राकेश कुमार, शोधार्थियों और विद्यार्थियों सहित डॉ. हरजीत सिंह ग्रोवर, गुरशरण कौर ग्रोवर, डॉ. पवन कुमार, योगेश कुमार, मनप्रीत सिंह, डॉ. ज्योति गोगिया आदि उपस्थित थे।
संगोष्ठी के संयोजक प्रो. सुनील शर्मा ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य हिंदी साहित्य में किसान-विमर्श को अकादमिक, सामाजिक और समकालीन संदर्भों में पुनः मूल्यांकित करना है। कार्यक्रम का समापन विद्वतापूर्ण विमर्श, सकारात्मक निष्कर्षों और सार्थक संवाद के साथ हुआ।

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