गेहूं के पराली अवशेष से बनेगा प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर

जीजेयू के वैज्ञानिकों को मिला महत्वपूर्ण शोध प्रोजेक्ट।

गेहूं के पराली अवशेष से बनेगा प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर

हिसार, गिरीश सैनी। गुरु जम्भेश्वर विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विवि के वैज्ञानिकों ने पराली जलाने की समस्या के समाधान और कृषि अपशिष्ट के मूल्य संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल शुरू की है। हरियाणा राज्य विज्ञान, नवाचार एवं प्रौद्योगिकी परिषद (एचएससीएसआईटी), हरियाणा सरकार द्वारा ₹35 लाख का शोध प्रोजेक्ट स्वीकृत किया गया है। जीजेयू के खाद्य प्रौद्योगिकी विभाग के शोधकर्ताओं को गेहूं के भूसे (व्हीट स्ट्रॉ) से प्राकृतिक फूड इमल्सीफायर विकसित करने के लिए यह शोध परियोजना मिली है। वेलोराइजेशन ऑफ व्हीट स्ट्रॉ फॉर द डेवलपमेंट ऑफ नेचुरल इमल्सीफायरः ए सस्टेनेबल सोलूशन फोर एग्रो-वेस्ट मैनेजमेंट शीर्षक से संचालित इस परियोजना का नेतृत्व प्रधान अन्वेषक (प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर) डॉ. उस्मान अली कर रहे हैं। उनके साथ सह-अन्वेषक (को-प्रिंसिपल इनवेस्टिगेटर) के रूप में डॉ. सोनिका तथा इंजी. अंकुर लूथरा कार्य करेंगे।

कुलपति प्रो. नरसी राम बिश्नोई ने डॉ. उस्मान अली व उनकी टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह परियोजना कृषि अपशिष्ट प्रबंधन और सतत विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। उन्होंने कहा कि गेहूं की पराली जैसी कृषि अवशेष सामग्री को मूल्यवान उत्पादों में परिवर्तित करना न केवल पर्यावरण संरक्षण में सहायक होगा, बल्कि किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी सृजित करेगा।

डॉ. उस्मान अली ने बताया कि इस परियोजना के परिणाम कृषि अपशिष्ट प्रबंधन, टिकाऊ खाद्य प्रणालियों तथा जैव-आधारित उत्पादों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। यह शोध किसानों, उद्योगों, शोधकर्ताओं तथा नीति-निर्माताओं के लिए उपयोगी सिद्ध होगा और हरियाणा में कृषि अवशेषों के वैज्ञानिक एवं आर्थिक उपयोग के नए आयाम स्थापित करेगा।

डीन आर एंड डी प्रो. नीरज दिलबागी, डीन एफईबीएसटी प्रो. अलका शर्मा, खाद्य प्रौद्योगिकी विभागाध्यक्षा प्रो. आराधिता बी.रे, प्रो. मनीष कुमार व डा. ज्योति प्रभा बिश्नोई ने भी शोध टीम को बधाई एवं शुभकामनाएं दी।

इस परियोजना के अंतर्गत एक जूनियर रिसर्च फेलो (जेआरएफ) का पद भी स्वीकृत किया गया है, जिससे युवा शोधार्थियों को अत्याधुनिक अनुसंधान कार्यों में भाग लेने और शोध कौशल विकसित करने का अवसर प्राप्त होगा। शोधकर्ताओं के अनुसार गेहूं का भूसा प्राकृतिक पॉलीसैकेराइड, विशेष रूप से सेल्यूलोज, का समृद्ध स्रोत है। परियोजना के तहत भूसे से सेल्यूलोज निकालकर उसे उन्नत सेल्यूलोज नैनोफाइबर (नैनो सेल्यूलोज) में परिवर्तित किया जाएगा। इसके बाद इस नैनो सेल्यूलोज का उपयोग प्राकृतिक, स्वच्छ-लेबल (क्लीन लेबल) और जैव-आधारित फूड इमल्सीफायर के रूप में किया जाएगा।

इमल्सीफायर खाद्य उद्योग में तेल और पानी को मिश्रित रखने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इनका प्रयोग सॉस, ड्रेसिंग, बेकरी उत्पादों तथा पेय पदार्थों में व्यापक रूप से किया जाता है। वर्तमान में उद्योग मुख्य रूप से सिंथेटिक या पशु-आधारित स्थिरकारी पदार्थों पर निर्भर है। ऐसे में पौध-आधारित नैनोसेल्यूलोज इमल्सीफायर प्राकृतिक खाद्य योजकों की बढ़ती वैश्विक मांग को पूरा करने में सहायक सिद्ध होगा। यह परियोजना ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ की अवधारणा को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है, जिसके तहत कृषि अपशिष्ट को पुनः उपयोग में लाकर आर्थिक मूल्य सृजित किया जाता है तथा पर्यावरणीय प्रभाव को कम किया जाता है।