महाशिवरात्रि : भीतर का उजाला
यह रात नहीं,
यह मौन का उत्सव है,
जब अंधेरे से
प्रश्न नहीं,
उत्तर जन्म लेते हैं।
शिव कोई प्रतिमा नहीं,
वह चेतना हैं,
जो शोर में भी
शांति खोज लेती है।
माथे पर गंगा—
विचारों की पवित्रता,
कंठ में विष
धैर्य की पराकाष्ठा।
शिव ने संसार छोड़ा नहीं,
बस उससे बंधे नहीं,
यही तो है
जीवन का संतुलन।
डमरू कहता है
हर गति में लय रखो,
और तांडव समझाता है
टूटना भी
नव सृजन है।
आज हर मन
विष से भरा है
ईर्ष्या का,
अहंकार का,
और असंतोष का।
शिव कहते हैं
नीलकंठ बनो,
दूसरों पर न उड़ेलो,
स्वयं साध लो।
इस शिवरात्रि
दीप बाहर नहीं,
अंदर जलाओ,
क्योंकि अंधकार
वहीं छिपा है।
जब भीतर का शिव जागता है,
तो समाज स्वयं
प्रकाशित हो जाता है।
यह रात
जागरण की नहीं,
जागृति की है।
हर हर महादेव।
( ललित बेरी)

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