साहित्य से रोजी रोटी नहीं चल सकती, मेरी किताब के विदेशी अनुवाद से पैसे मिले : बेबी हालदार 

साहित्य से रोजी रोटी नहीं चल सकती, मेरी किताब के विदेशी अनुवाद से पैसे मिले : बेबी हालदार 
बेबी हालदार मुंशी प्रेमचंद के नाती प्रबोध कुमार के साथ। 

-कमलेश भारतीय 
साहित्य से रोजी रोटी नहीं चल सकती । मेरी पहली ही किताब इतनी चर्चित हूई कि देश विदेश की 27 भाषाओं में अनुवाद हुई जिससे मुझे पैसे मिले और अपना घर भी बना पाई । यह कहना है प्रसिद्ध लेखिका बेबी हालदार का । जिनके बारे में बहुत पढ़ा व सुना था कि वे कैसे दिल्ली में घरों में कामकाज खोजते खोजते उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद के नाती प्रबोध कुमार के घर काम करने लगीं जिससे उनकी जिंदगी ही बदल गयी और वे उनकी प्रेरणा से प्रसिद्ध लेखिका बन गयीं । मेरी मुलाकात अभी पिछले माह उत्तराखंड के दिनेशपुर के लघु पत्रिका सम्मेलन में बेबी हालदार से हुई और तभी वादा लिया था कि एक दिन आपसे फोन पर ही बातचीत कर इंटरव्यू करूंगा और आज वह वादा पूरा कर दिया बेबी हालदार ने ।।हालांकि दो चार दिन पहले इनका जन्मदिन था लेकिन उस दिन वे गुरुग्राम के किसी काॅलेज में व्याख्यान के लिए जा रही थीं तो टाल देना पड़ा । बहुत सरल स्वभाव की बेबी हालदार ने दिनेशपुर में खूब बातचीत की । 
मूल रूप से पश्चिमी बंगाल के 24 परगना निवासी बेबी हालदार के पिता जम्मू कश्मीर में सेना में तैनात थे । फौजी होने के नाते शराब के आदी थे और मां से मारपीट करते रहते थे जिससे एक दिन मां हम बच्चों को छोड़कर चली गयीं । फिर मेरे पिता ने मेरी शादी मुझसे दुगुनी उम्र के आदमी से कर दी और इक्कीस साल की होते होते मेरे तीन बच्चे भी हो गये । मेरे पिता ने दूसरी शादी भी कर ली ।
मेरे पति भी कोई बहुत अच्छे न थे और आखिरकार मैं अपने बच्चों को साथ लेकर सन् 1999 में दिल्ली चली आई और मेरी खुशकिस्मती कि मुझे मुंशी प्रेमचंद के नाती प्रबोध कुमार के घर काम मिल गया । जिन्होंने किताब व लेखन के प्रति मेरी रूचि को देखते हुए अपनी जीवन गाथा लिखने को प्रेरित किया । 
 

-आपकी शिक्षा कहां तक हुई ?
-आठवीं कक्षा तक । आगे पढ़ाया ही नहीं जबकि मैं बहुत रोई पढ़ने के लिए । 
-आपने किस भाषा में लिखी अपनी जीवन कथा ?
-बंगाली में और प्रबोध कुमार जी इसे हिंदी में अनुवाद करते चले गये और आखिर उन्होंने इसे प्रकाशक को सौंपा । प्रबोध जी बंगाली जानते थे ।
-क्या नाम है आपकी पुस्तक का ?
-आलो अंधारी यानी अंधेरे से उजाला । इसका हिंदी में अर्थ । 
-इस किताब का कैसा स्वागत् हुआ ?
-उम्मीद से कहीं ज्यादा । आप हैरान होते कि इसका देश विदेश की 27 भाषाओं में अनुवाद हुआ । सब जगह इस किताब की चर्चा होने लगी । 
-और कितनी किताबें लिखीं ?
-ईशित समयांतर यानी परिवर्तन हिंदी में । तीसरी किताब आई जिसका हिंदी में अर्थ घर के रास्ते पर । इस तरह अब तक तीन किताबें आ चुकी हैं । 
-नयी किताब लिख रही हैं कोई ?
-जी । चौथी किताब भी लिख रही हूं । 
-आपको कौन कौन से लेखक पसंद हैं ?
-शरतचंद्र , महाश्वेता देवी , अन्नपूर्णा देवी और सभी पुराने लेखक अच्छे लगते हैं । 
-कोई पुरस्कार मिला ?
-अनेक । विदेशी पुरस्कार भी मिले ।
-आम राय है कि आजकल लोग पुस्तकों से दूर जा रहे हैं ?
-कौन कहता है ? काफी पढ़ते हैं लोग आज भी साहित्य । यदि ऐसा न हो तो हम लिखें ही क्यों ?
-क्या साहित्य लेखन से रोजी रोटी चल सकती है ?
-नहीं चल सकती । मुश्किल है । सिर्फ लेखन से गुजारा मुश्किल है । यदि मेरी पहली पुस्तक विदेशों में अनुवादित न होती तो मुझे पैसे कहां से मिलते ? घर कैसे ले पाती ? अब भी कोई बहुत अच्छी स्थिति नहीं है । सरकार को लेखकों के बारे में सोचना चाहिए । 
-किसी पाठ्य पुस्तक में भी आपको शामिल किया गया है ?
-जी । एनसीईआरटी की ग्यारहवीं की पुस्तक में मेरी रचना शामिल है । 
-परिवार के बारे में बताइए ?
-मेरे तीन बच्चे हैं -दो लड़के और एक लड़की । बड़ा बेटा अपने पिता के पास रहता है लेकिन कभी कभार मिलने आ जाता है । तीनों काम पर लग गये हैं ।
-प्रबोध कुमार जी हैं अभी ?
-जी नहीं । पिछले वर्ष 19 जनवरी को उनका निधन हो गया ।
-आगे क्या लक्ष्य ?
-बस लेखन ही लेखन ।
हमारी शुभकामनाएं बेबी हालदार को ।

बेबी हालदार के साथ कमलेश भारतीय दिनेशपुर में।