दशम ग्रंथ के 'कृष्णावतार' का सामाजिक दृष्टि से पुनर्पाठ समय की आवश्यकता : प्रो. सुनील कुमार
अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पंजाब तथा विचार विकास केंद्र, कबीर पार्क, अमृतसर के संयुक्त तत्वावधान में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग में वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक डॉ. शमीर सिंह की सद्य: प्रकाशित एवं चर्चित पुस्तक 'कृष्णावतार का सामाजिक सर्वेक्षण : दशम ग्रंथ के संदर्भ में' के लोकार्पण एवं उस पर केंद्रित विचार-गोष्ठी का आयोजन गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय गायन से हुआ तथा समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।
अखिल भारतीय साहित्य परिषद, पंजाब तथा विचार विकास केंद्र, कबीर पार्क, अमृतसर के संयुक्त तत्वावधान में गुरु नानक देव विश्वविद्यालय, अमृतसर के हिंदी विभाग में वरिष्ठ साहित्यकार एवं चिंतक डॉ. शमीर सिंह की सद्य: प्रकाशित एवं चर्चित पुस्तक 'कृष्णावतार का सामाजिक सर्वेक्षण : दशम ग्रंथ के संदर्भ में' के लोकार्पण एवं उस पर केंद्रित विचार-गोष्ठी का आयोजन गरिमापूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सुनील कुमार ने की। कार्यक्रम का शुभारंभ विश्वविद्यालय गायन से हुआ तथा समापन राष्ट्रगान के साथ किया गया।
पुस्तक का लोकार्पण विद्वानों एवं अतिथियों द्वारा सामूहिक रूप से किया गया। इसके उपरांत आयोजित विचार-गोष्ठी में वक्ताओं ने पुस्तक की विषयवस्तु, उसकी शोधपरकता, वैचारिक गंभीरता तथा समकालीन प्रासंगिकता पर विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुनील कुमार ने कहा कि भारतीय परंपरा के महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का आधुनिक सामाजिक दृष्टि से पुनर्पाठ आज की अकादमिक आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि डॉ. शमीर सिंह की यह कृति केवल दशम ग्रंथ के कृष्णावतार का अध्ययन नहीं, बल्कि भारतीय समाज, संस्कृति, नैतिक मूल्यों और सामाजिक संरचना का गहन विश्लेषण प्रस्तुत करती है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों का दायित्व केवल ज्ञान का प्रसार करना ही नहीं, बल्कि ऐसे विमर्शों को प्रोत्साहित करना भी है जो समाज और साहित्य के बीच सार्थक संवाद स्थापित करें। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह पुस्तक शोधार्थियों, अध्यापकों तथा साहित्य के गंभीर अध्येताओं के लिए एक उपयोगी संदर्भ ग्रंथ सिद्ध होगी। उन्होंने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में हिंदी विभाग की समृद्ध परंपरा और डॉ. धर्मपाल मैनी के अवदान को भी रेखांकित किया।
मुख्य वक्ता डॉ. प्रेम प्रकाश पुंज ने कहा कि डॉ. शमीर सिंह ने दशम ग्रंथ के कृष्णावतार का अध्ययन अत्यंत व्यापक दृष्टि से किया है। उन्होंने कहा कि लेखक ने धार्मिक आख्यानों को सामाजिक संदर्भों से जोड़ते हुए यह सिद्ध किया है कि भारतीय महाकाव्य और परंपरागत ग्रंथ आज भी सामाजिक चेतना के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके अनुसार पुस्तक में ऐतिहासिक तथ्यों, सांस्कृतिक संदर्भों और सामाजिक विश्लेषण का संतुलित समन्वय दिखाई देता है, जो इसे विशिष्ट बनाता है।
अपने वक्तव्य में डॉ. चमन जुनेजा ने पुस्तक को गंभीर अनुसंधान और दीर्घकालीन अध्ययन का परिणाम बताते हुए कहा कि लेखक ने तथ्यों, प्रमाणों और संदर्भों के आधार पर अत्यंत संतुलित निष्कर्ष प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने कहा कि पुस्तक की भाषा सहज, विश्लेषण तार्किक तथा प्रस्तुति अकादमिक गरिमा से परिपूर्ण है। यह कृति साहित्य, इतिहास, संस्कृति और समाजशास्त्र के अंतर्संबंधों को समझने की नई दृष्टि प्रदान करती है।
डॉ. राकेश प्रेम ने कहा कि डॉ. शमीर सिंह का लेखन समाज और संस्कृति के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि लेखक ने कृष्णावतार के माध्यम से शक्ति, न्याय, लोकमंगल, सामाजिक समरसता और मानवीय मूल्यों जैसे विषयों का गंभीर विवेचन किया है। उन्होंने इस पुस्तक को समकालीन हिंदी आलोचना और शोध-जगत की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि बताते हुए कहा कि ऐसी कृतियाँ भारतीय ज्ञान-परंपरा को नए विमर्शों से जोड़ने का कार्य करती हैं।
इस अवसर पर पुस्तक के लेखक डॉ. शमीर सिंह ने अपनी रचना-प्रक्रिया पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इस पुस्तक के पीछे वर्षों का सतत अध्ययन, मनन और शोध निहित है। उन्होंने कहा कि भारतीय ग्रंथों को केवल धार्मिक आस्था के आधार पर नहीं, बल्कि उनके सामाजिक, सांस्कृतिक और मानवीय पक्षों के आलोक में भी पढ़ा जाना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन के विविध अनुभव साझा करते हुए कहा कि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य समाज में संवेदनशीलता, विवेक और सकारात्मक परिवर्तन की चेतना का विकास करना है। उन्होंने आयोजनकर्ताओं, वक्ताओं, हिंदी विभाग तथा उपस्थित सभी विद्वानों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का प्रभावी एवं सुसंगठित संचालन हिंदी विभाग के शोधार्थी और अभासप, पंजाब के शोधार्थी आयाम के प्रमुख श्री मुकेश कुमार ने किया। उन्होंने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की तथा वक्ताओं का परिचय कराया।
इस अवसर पर डॉ. शमीर सिंह की पुत्रवधू, पौत्र एवं पौत्रवधू सहित हिंदी विभाग के प्राध्यापकगण, शोधार्थी, विद्यार्थी, साहित्यकार एवं बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे। पूरे कार्यक्रम में गंभीर वैचारिक वातावरण बना रहा और उपस्थित विद्वानों ने पुस्तक को हिंदी साहित्य एवं भारतीय सांस्कृतिक अध्ययन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण योगदान बताया।
गोष्ठी का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
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