लघुकथा/आत्मनिर्भर/मनोज धीमान

लघुकथा/आत्मनिर्भर/मनोज धीमान
मनोज धीमान।

तीन दशक से ऊपर हो गए हैं। रजनी के पति राजनीति में हैं। दो बार विधायक रह चुके हैं। इस बार फिर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। उनको ना घर की, ना घरवालों की कोई चिंता है। हर समय दिमाग राजनीति के लिए घोड़े दौड़ाता नज़र आता है। पिछले छह वर्ष से कह रही हूँ कि बेटी की उम्र निकले जा रही है। बेटी के हाथ पीले कर दो। लेकिन इनको तो बेटी की कोई चिंता ही नहीं है। हर बार यही उत्तर देते हैं - अभी उचित समय नहीं आया है। जब उचित समय आएगा तो बेटी की शादी कर दूंगा। पता नहीं उचित समय कब आएगा। बेटी तीस की होने वाली है। इसी बीच विधानसभा के चुनाव आ गए। रजनी के पति ने एक बार फिर जीत हासिल की। उसके पति तीसरी बार विधायक चुने गए। पार्टी में उनका कद बढ़ गया। इस बार उन्हें मंत्रीपद भी मिल गया। मंत्रालय भी बढ़िया मिल गया। कुछ समय बाद उन्होंने बेटी के लिए अच्छा रिश्ता ढूँढा और झटपट मंगनी कर दी। शादी की तारीख भी तय हो गई। रजनी बहुत खुश थी। शादी की सब तैयारियां हो गयीं। रजनी के पति की जेब से बेटी की शादी पर एक पैसा भी खर्च ना हुआ। बल्कि शादी में शामिल हुए सैंकड़ों लोगों के हजूम ने उनका घर बेशकीमती तोहफों से भर दिया। लाखों करोड़  रूपए शगुन के तौर पर इक्क्ठे हो गए। शगुन का कैश इतना जमा हो गया कि उसे बोरियों में भर कर रखना पड़ा। इसी उचित समय की तो वह पिछले कई वर्षों से प्रतीक्षा कर रहे थे। आत्मनिर्भर होने के बाद ही वह अपनी बेटी के हाथ पीले करना चाहते थे।