कविता/क्षितिज का छोर/ डा. विजय दिसावर

कविता/क्षितिज का छोर/ डा. विजय दिसावर

क्षितिज का वह छोर 
      शाम हो या भोर
जहां तलक जाए नज़र,
         है वहीं खड़ा।
वह मेरा क्षितिज 
और तेरा क्षितिज 
अलग-अलग हैं 
       दूरियां जितनी।
सात रंग की 
डोर में है झूलती
          वह क्षितिज पर। 
शाम का डर है 
रात का है डर  
भोर की उम्मीद 
      आंख क्षितिज पर।
धरा ने बांध कर
       रख लिया उसे। 
ढूंढता हूं अक्स
     उसका क्षितिज पर।
पांव हैं बंधे
इधर और भी 
कोई ले बुला
   उन्हें भी क्षितिज पर। 
ख़ूब सुने थे
ख़ूब सुनाए
कौन जा गाए  ?
    अब गीत क्षितिज पर।

पर्वतों का जल 
बन गया झरना 
बह रहा है वह भी       
निरंतर!

लौटते पंछी 
शाम को घर।
आसमां वहीं 
यह धरा वहीं 
     देखते सब कुछ।

एक वह कुआं 
जल से लबालब 
   सूख गया अब। 
है वहीं खड़ा 
आंख है खुली 
ज़मीन में गड़ा।
है वहीं खड़ा। 

पी गई ज़मीन 
अपने ही जल को 
क्या करे अब वो।
      है वहीं खड़ा।

बादलों चलो 
गुनगुनाओ गीत 
  सुने कोई मीत।
अब हमारा गीत। 
   क्यों सुने सागर 
इक नदी का गीत
हैं समां गईं 
अब कई नदियां 
     सागर के बीच। 

अब मेरी नज़र 
बस क्षितिज पर। 
कोई भी सागर
     उसे ना पिएगा 
इस लिए यह मन
क्षितिज पे जिएगा।
इस लिए यह मन 
क्षितिज पे जिएगा।                  

     - विजय दिसावर 
        ब्रैंपटन (कनेडा)