दो हजार साल पुरानी केरल की जीवित संस्कृत रंगमंच कला कूडियाट्टम सुपवा में प्रदर्शित

मानवता की मौखिक व अमूर्त धरोहर की उत्कृष्ट कृति के रूप में यूनेस्को से मिली है मान्यता

दो हजार साल पुरानी केरल की जीवित संस्कृत रंगमंच कला कूडियाट्टम सुपवा में प्रदर्शित

रोहतक, गिरीश सैनी। दादा लख्मी चंद राज्य प्रदर्शन एवं दृश्य कला विवि (डीएलसी सुपवा), रोहतक में दो हजार साल से अधिक पुरानी परंपरा के तहत केरल की जीवित संस्कृत रंगमंच कला कूडियाट्टम का प्रदर्शन एक्टिंग कोर्स के छात्रों द्वारा किया गया। उल्लेखनीय है कि यूनेस्को ने वर्ष 2001 में कूडियाट्टम को दुनिया में मानवता की मौखिक व अमूर्त धरोहर की उत्कृष्ट कृति के रूप में मान्यता दी थी।

एफटीवी विभाग के एफसी महेश टीपी ने बताया कि कूडियाट्टम सिर्फ रंगमंच नहीं, बल्कि अभिनय कला की एक मास्टरक्लास है। मिरव ढोल की लयबद्ध धड़कन व आंखों की जटिल भाषा (नेत्राभिनय) के माध्यम से यह मंच को एक पवित्र स्थान में बदल देता है, जहां मानव और दैवीय मिलते हैं। इस कला को चेहरे की उच्च स्तर की अभिव्यक्तियों व हाथों के इशारों के लिए जाना जाता है। कूडियाट्टम में मुख्य विषय हिंदू महाकाव्यों रामायण और महाभारत से लिए गए हैं। फिल्म और टेलीविजन विभाग द्वारा 2024 बैच के छात्रों के लिए कूडियाट्टम कार्यशाला आयोजित की गई।

कुलपति डॉ अमित आर्य ने कहा कि इस प्रकार की मास्टर क्लास का आयोजन छात्रों को अभिनय के क्षेत्र में बेहतरीन ढंग से ट्रेंड करने के लिए किया जाता है। इससे वे न सिर्फ कला को सीखते हैं, बल्कि अन्य प्रदेशों की संस्कृति से भी रूबरू होते हैं। बतौर विशेषज्ञ, सूरज नांबियार ने मास्टर क्लास दी। मिरव ढोल पर कलामंडलम विजय व छात्र कलाकारों के मेकअप के लिए अवस्थी सरोजिनी मौजूद रहीं।

कुलपति डॉ आर्य ने बताया कि प्रस्तुति के दौरान छात्रों ने कूडियाट्टम के तहत पांच अलग-अलग अध्यायों का मंचन किया, जिसमें भगवान शिव और पार्वती की कहानी भी शामिल रही। छात्रों ने श्रृंगार (प्रेम) व दोनों देवी-देवताओं के संतुलन को बखूबी दर्शाया।