लघुकथा/ खोया हुआ कुछ 

लघुकथा/ खोया हुआ कुछ 
कमलेश भारतीय।

-सुनो । 
-कौन ?
-मैं । 
-मैं कौन ?
- अच्छा । अब मेरी आवाज भी नहीं पहचानते ?
- तुम ही तो थे जो काॅलेज तक एक सिक्युरिटी गार्ड की तरह चुपचाप मुझे छोड़ जाते थे । बहाने से मेरे काॅलेज के आसपास मंडराया करते थे । सहेलियां मुझे छेड़ती थीं । मैं कहती कि नहीं जानती ।
- मैं ? ऐसा करता था ?
- और कौन ? बहाने से मेरे छोटे भाई से दोस्ती भी गांठ ली थी और घर तक भी पहुंच गये । मेरी एक झलक पाने के लिए बड़ी देर बातचीत करते रहते थे । फिर चाय की चुस्कियों के बीच मेरी हंसी तुम्हारे कानों में गूंजती थी । 
- अरे ऐसे ?
- हां । बिल्कुल । याद नहीं कुछ तुम्हें ?
- फिर तुम्हारे लिए लड़की की तलाश शुरू हुई और तुम गुमसुम रहने लगे पर उससे पहले मेरी ही शादी हो गयी । 
-एक कहानी कहीं चुपचाप खो गयी । 
- कितने वर्ष बीत गये । कहां से बोल रही हो ?
- तुम्हारी आत्मा से । जब जब तुम बहुत उदास और अकेले महसूस करते हो तब तब मैं तुम्हारे पास होती हूं । बाॅय । खुश रहा करो । जो बीत गयी सो गयी ।
-कमलेश भारतीय