कुंजुम बुक्स में कार्तिकेय वाजपेयी का आत्मचिंतन से भरपूर साहित्यिक संवाद
कुंजुम बुक्स में एक विचारोत्तेजक साहित्यिक संध्या का आयोजन हुआ, जहाँ लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने नीलिमा डालमिया अधर—प्रख्यात लेखिका एवं प्रभा खेतान फाउंडेशन की दिल्ली/एनसीआर संयोजक तथा पत्रकार, आलोचक और इतिहासकार मुर्तज़ा अली ख़ान के साथ गहन और आत्मचिंतनपूर्ण संवाद किया।
कुंजुम बुक्स में एक विचारोत्तेजक साहित्यिक संध्या का आयोजन हुआ, जहाँ लेखक कार्तिकेय वाजपेयी ने नीलिमा डालमिया अधर—प्रख्यात लेखिका एवं प्रभा खेतान फाउंडेशन की दिल्ली/एनसीआर संयोजक तथा पत्रकार, आलोचक और इतिहासकार मुर्तज़ा अली ख़ान के साथ गहन और आत्मचिंतनपूर्ण संवाद किया।
सत्र में जागरूकता, उपस्थिति और विचार व अवलोकन के आपसी संबंध पर गहन और सूक्ष्म विमर्श हुआ। आत्मीय और सीमित श्रोताओं के बीच संवाद करते हुए कार्तिकेय ने रेखांकित किया कि विचार, पहचान (आइडेंटिफिकेशन) के माध्यम से, अक्सर वर्तमान को अतीत से जोड़ देता है—और इस प्रक्रिया में हमें जीवंत क्षण से दूर ले जाता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विचार और अवलोकन का एक साथ अस्तित्व संभव नहीं है। जहाँ शुद्ध अवलोकन है, वहाँ विचार का हस्तक्षेप नहीं होता; और जहाँ विचार सक्रिय है, वहाँ सच्चा अवलोकन अनुपस्थित रहता है। अवलोकन हमें ‘अभी’ में जड़ित रखता है, जबकि विचार हमें उससे विचलित कर देता है।
कार्तिकेय वाजपेयी ने कहा “जीवंत वर्तमान में बने रहने के लिए हमें केवल उसका साक्षी बनना है—बिना विचारों से जुड़े हुए। विचार और अवलोकन एक साथ संभव नहीं हैं: जहाँ विचार उपस्थित होता है, वहाँ अवलोकन अनुपस्थित हो जाता है, और जहाँ सच्चा अवलोकन होता है, वहाँ विचार नहीं रहता। अवलोकन हमें उसी क्षण में स्थिर रखता है, जबकि विचार हमें उससे दूर ले जाता है”।
यह सत्र कार्तिकेय की शांत गहराई और उनकी चिंतनशील लेखन-शैली का सजीव प्रतिबिंब था, विशेष रूप से उनके प्रथम उपन्यास द अनबिकोमिंग के संदर्भ में। यह कृति प्रदर्शन और उपस्थिति के बीच की सूक्ष्म दूरी, तथा उस ‘स्व’ के द्वंद्व को टटोलती है—एक ओर वह स्व जिसे हम स्वयं गढ़ते हैं, और दूसरी ओर वह स्व जो समय के साथ धीरे-धीरे सहज, कोमल और वास्तविक रूप में उभरता है।
यह संवाद द अनबिकोमिंग के केंद्रीय दर्शन की सशक्त प्रतिध्वनि है, जिसे कार्तिकेय एक प्रामाणिक अस्तित्व की अवस्था में लौटने की प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करते हैं—एक ऐसी अवस्था, जो सफलता, लक्ष्य-केन्द्रित जीवन, उपलब्धियों और स्वीकृति/मान्यता की विरोधाभासी आकांक्षाओं से परे है। यह कृति सफलता की पारंपरिक परिभाषाओं पर प्रश्नचिह्न लगाती है और इसके स्थान पर पाठकों को स्थिरता, जागरूकता और उस ‘स्व’ से पुनः जुड़ने के लिए आमंत्रित करती है, जो मूलतः पूर्ण और संतुष्ट है।
पुस्तक और वाजपेयी के लेखन पर टिप्पणी करते हुए नीलिमा डालमिया अधर ने कहा, “उनकी पुस्तक द अनबिकोमिंग उस सूक्ष्म और संवेदनशील अंतरिक्ष में प्रवेश करती है, जहाँ प्रदर्शन और उपस्थिति, प्रयास और क्षरण, तथा उस ‘स्व’ के बीच की सीमाएँ धुंधली पड़ जाती हैं—एक ओर वह स्व जिसे हम गढ़ते हैं, और दूसरी ओर वह स्व जो धीरे-धीरे शांत, कोमल और सहज होने लगता है। उनकी आवाज़, जो कथा और अनुशासित स्थिरता से निर्मित है, अत्यंत सुंदरता से इस प्रश्न को उभारती है—‘जब हम स्वयं को योग्य ठहराने का प्रयास छोड़ देते हैं, तब हम वास्तव में क्या रह जाते हैं?’”
कुंजुम बुक्स के गर्मजोशी भरे और आत्मीय वातावरण में आयोजित इस सत्र ने श्रोताओं को पहचान, आत्म-बोध और उस मूल सार पर गहराई से मनन करने के लिए प्रेरित किया—जो तब शेष रह जाता है, जब हम किसी और बनने की कोशिश करना छोड़ देते हैं।इस अवसर पर कई विशिष्ट अतिथि भी उपस्थित रहे, जिनमें अजय जैन — लेखक एवं कुंजुम बुक्स के संस्थापक; मनीषा चौधरी— प्रकाशक एवं जयपुर बुकमार्क की सह-निदेशक; तथा मल्गोर्ज़ाता वेज्सिस गोलेबिअक — मंत्री प्लेनिपोटेंशियरी और पोलिश इंस्टिट्यूट नई दिल्ली की निदेशक शामिल थीं। इनके अलावा समुदाय के कई अन्य प्रतिष्ठित सदस्य भी इस सत्र का हिस्सा बने।

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